वक्फ संशोधन विधेयक को मिला समर्थन: राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, मुस्लिम महिला बोर्ड और वक्फ अध्यक्ष ने रखा पक्ष
वक्फ संशोधन विधेयक को लेकर देशभर में हो रही चर्चा के बीच कई प्रमुख हस्तियों ने इसका खुलकर समर्थन किया है। बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान, ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर, और उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने विधेयक को जनहित में उठाया गया कदम बताया है।
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“गैर-मुस्लिमों का भी वक्फ संपत्ति पर हक है” — आरिफ मोहम्मद खान
बिहार के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि वक्फ की संपत्तियां अल्लाह की मानी जाती हैं, और इनका उपयोग गरीबों, जरूरतमंदों और जनहित के लिए होना चाहिए। उन्होंने अपने दावे को कुरान के हवाले से स्पष्ट करते हुए कहा कि कुरान में दो तरह के जरूरतमंदों—फकीर (मुस्लिम) और मिस्कीन (गैर-मुस्लिम)—का उल्लेख है, जिसका अर्थ है कि वक्फ से सभी जरूरतमंदों को लाभ मिलना चाहिए।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि पटना जैसे शहर में वक्फ की तमाम संपत्तियों के बावजूद वहां कोई अस्पताल या अनाथालय क्यों नहीं है। साथ ही उन्होंने वक्फ विधेयक के विरोध पर कहा कि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हर व्यक्ति को अपने विचार रखने का अधिकार है।
“महिलाओं को मिले अधिकार, वक्फ बोर्ड में हो पारदर्शिता” — शाइस्ता अंबर
लखनऊ में ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की अध्यक्ष शाइस्ता अंबर ने भी विधेयक का समर्थन करते हुए कहा कि जो कदम अब सरकार ने उठाया है, वही कदम पिछली सरकारों और धार्मिक नेताओं को उठाना चाहिए था। उन्होंने सरकार से वक्फ बोर्ड के कामकाज में पारदर्शिता लाने और मुस्लिम महिलाओं के अधिकार सुनिश्चित करने की भी मांग की।
“विरोध करने वाले राजनीतिक मुसलमान हैं, गरीब नहीं” — शादाब शम्स
उत्तराखंड वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष शादाब शम्स ने कहा कि वक्फ संशोधन विधेयक का विरोध करने वाले वास्तव में गरीब मुसलमान नहीं, बल्कि राजनीतिक मुसलमान हैं। उन्होंने दावा किया कि यह विधेयक धार्मिक भावना के बजाय पारदर्शिता और न्याय की ओर बढ़ा कदम है।
वक्फ संशोधन विधेयक पर इन प्रमुख मुस्लिम नेताओं और संगठनों के समर्थन से यह साफ हो रहा है कि इस मुद्दे पर समाज के भीतर विचारों में विविधता है, और विधेयक को केवल विरोध का नहीं, बल्कि सुधार और न्याय का अवसर भी माना जा रहा है।



