गांधी नगर गृह निर्माण संस्था में सहकारिता विभाग का फर्जीवाड़ा जारी, जांच में दोषी पाए जाने के बाद भी मेट्रो के लिए आवंटित जमीन बेचने वालों पर अब तक कार्रवाई नहीं

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इंदौर। गांधी नगर गृह निर्माण संस्था में कई बार शिकायतों और जांच के बाद भी आज भी सहकारिता विभाग का फर्जीवाड़ा जारी है। संस्था के प्रबंधक फूलचंद पांडे ने मेट्रो के लिए आवंटित जमीन में से नियम विरुद्ध 20 प्लॉट बेच दिए थे। इसकी विभागीय जांच भी हुई और पांडे को दोषी भी माना गया, लेकिन रिपोर्ट आने के सात महीने बाद भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

उल्लेखनीय है कि गांधी नगर गृह निर्माण संस्था को आवंटित जमीन में मेट्रो रेल के लिए भी भूमि आवंटित हुई थी। संस्था के प्रबंधक फूलचंद पांडेय ने मेट्रो की जमीन में से 20 प्लॉट संस्था के कुछ सदस्यों की मिलीभगत से बेच दिए। इसके एवज में करोड़ों रुपए वसूले गए। जब शिकायत हुई तो सहकारिता विभाग को जांच बिठानी पड़ी। जांच में प्रबंधक फूलचंद पांडेय को दोषी मानते हुए उनके खिलाफ धोखाधड़ी का प्रकरण दर्ज करने की सिफारिश की गई, लेकिन यह जांच प्रतिवेदन सहकारिता विभाग की फाइलों में धूल खाता रहा।

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जांच में पांडेय और संचालक मंडल दोषी

बताया जाता है कि यह जांच जुलाई 2025 में ही पूरी हो गई थी। जांच करने वाले अंकेक्षण अधिकारी सहकारिता इन्दौर के.के.जमरे तथा सहायक आयुक्त (अंके.) सहकारिता, जिला इंदौर .पी.एस.बिलोदिया ने प्रबंधक फूलचंद पांडेय को दोषी पाया। जांच रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा है कि संस्था प्रबंधक एवं पूर्व तथा वर्तमान संचालक मंडल द्वारा .प्र सहकारी सोसायटी अधिनियम 1960 के प्रावधानो एवं संस्था की पंजीकृत उपविधियों का स्पष्ट रूप से उल्लंघन किया गया है। प्रबंधक और संचालक मंडल ने संस्था के अभिन्यास में बदलाव एवं छेड़छाड़ किया है। संस्था द्वारा सर्वे कं. 307/5 में रिक्त शासकीय भूमि में अवैध रूप से भूखंड दर्शा कर आवंटन एवं नामांतरण आदि दर्शा कर एवं अवैध रूप से सदस्यता प्रदान कर राशि वसूली गई। इस कारण संस्था के वर्तमान एवं पूर्ववर्ती संचालक मंडल के खिलाफ वैधानिक एवं दंडात्मक कार्यवाही की जाना उचित होगा।

40 लाख रुपए में सौदे का आरोप

सूत्र बताते हैं कि जांच के बाद कार्रवाई रुकवाने के लिए वरिष्ठ अधिकारियों से 40 लाख रुपए में सौदा हुआ है। चूंकि मेट्रो की जमीन बेचकर करोड़ों रुपए दोषियों के पास आ गए हैं, इसलिए वे कार्रवाई रुकवाने के लिए खूब पैसे खर्च कर रहे हैं। यही वजह है कि जांच पूरी होने के बाद भी वरिष्ठ अधिकारी प्रबंधक पांडेय और संचालक मंडल के दोषी सदस्यों पर कार्रवाई नहीं कर पा रहे।

2020 में भी हुई जांच भी फाइलों में

इससे पहले सहकारिता विभाग के तत्कालीन अंकेक्षण अधिकारी जीएस परिहार ने गांधी नगर संस्था के मामले में धारा 59 का प्रतिवेदन 08 दिसंबर 2020 को उपायुक्त, सहकारिता को प्रस्तुत किया था। इसमें कई गंभीर अनियमितताएं मिली थीं। परिहार के प्रतिवेदन में स्पष्ट उल्लेख है कि तत्कालीन उपायुक्त सहकारिता एमएल गजभिये, उप अंकेक्षक आशीष सेठिया, तत्कालीन प्रशासक सहकारी निरीक्षक प्रवीण जैन (वर्तमान में सेवानिवृत्त), संस्था प्रबंधक फूलचंद पाण्डेय ने जानबूझकर कार्रवाई को टाला। इसलिए इन सभी को दोषी माना गया था। इस प्रकरण में भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

थाने में दस्तावेज होने के बाद भी बिक गए प्लॉट

संस्था के अभिलेख वर्ष 2013 में थाने में जमा हो गए थे। इसके बाद भी आशीष सेठिया, उप अंकेक्षक के दोनों भाइयों को भूखंड की रसीदें जारी की गईं। इसके लिए कोई अनुमति नहीं ली गई और नई रसीद बुक खरीद कर सेठिया के भाइयों को रसीदें जारी कर दी गईं। मेट्रो की जमीन बेचने के मामले में भी यही सवाल है कि जब सारे दस्तावेज थाने में जमा हैं, तो ये जमीनें बिकीं कैसे?

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