डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
इस फिल्म का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह खुद को बहुत गंभीरता से नहीं लेती। आदिवासी, समुद्री लुटेरे , भूत, जानवर के साथ ह्यूमन चेन वाले सीन, बैलून सीक्वेंस, ऊँचाई का डर – सब हँसने का मसाला हैं। फिल्म देखकर लगता है कि दिमाग की वारंटी खत्म हो चुकी है।सर्कस जैसी है यह फिल्म, जिसमें जूने – पुराने कलाकार हंसाने के लिए जोकरों की तरह आ गए हैं, और उछल-कूद कर रहे हैं। उन बेचारों को लगता है कि यही कॉमेडी है !
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निर्माता -निर्देशक को पता है कि वह फिल्म वास्तव में क्या है — एक पूरी तरह पागल, ऊल-जुलूल और बेफिक्र कॉमेडी। इसमें भी वेलकम की तरह कलाकारों की भीड़ हैं। ट्रेजर ऑफ़ लाइफ नाम का कुछ भारी-भरकम खजाना, एक रहस्यमयी द्वीप जो अंग्रेजी के एम अक्षर के आकार का है और हमारे एक्टर्स अजय देवगन, रितेश देशमुख, अरशद वारसी, जावेद जाफरी, रवि किशन, संजय मिश्रा, उपेंद्र लिमये, अंजलि आनंद, संजीदा शेख़, ईशा गुप्ता और विजय पाटकर आदि खजाने की तलाश में निकल पड़े हैं।
रास्ते में हैं समुद्री लुटेरे, भूत, मगरमच्छ, टाइगर, साँप, ऑक्टोपस… बस, ये पूछो क्या नहीं है! फिल्म में ये प्राणी डराने नहीं, हंसाने आते हैं। इस फिल्म का एडवेंचर भी हँसाने के लिए है। दूरस्थ द्वीप के आदिवासी भी हंसाने के लिए है, परिवार, प्रेम, शादी, मंदिर, पूजा सभी कुछ हंसाने के लिए हैं। हंसाने के लिए बॉडी शेमिंग और दूसरी चीजें भी हैं।
कुछ फिल्में लॉजिक से चलती हैं, कुछ इमोशन से और कुछ इस सिद्धांत पर कि ‘जो भी हो … बस मजा आना चाहिए!’ धमाल 4 तीसरी श्रेणी की फिल्म है। अगर आप विचारशील नहीं हैं और ढाई घंटे तक अपनी रोजमर्रा की परेशानियां भूलकर मूर्खताएं देखना और हंसना चाहते हैं, तो ‘धमाल 4’ आपके लिए एक तरह की कॉमेडी थेरेपी हो सकती है।
पुरानी ‘धमाल’ फिल्मों की तरह यहां भी हर किरदार किसी न किसी लालच, गलतफहमी या मूर्खता का शिकार है। कोई जल्दी अमीर बनना चाहता है, कोई खुद को सबसे श्याणा समझता है और अंत में पता चलता है कि सब मिलकर उतने ही बुद्धिमान हैं, जितना मोबाइल के कैलकुलेटर से चाय बनाने की कोशिश करना।
कुछ दृश्य इतने अतार्किक हैं कि न्यूटन अगर थिएटर में बैठे होते तो गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत वापस ले लेते। कलाकारों की टोली अपनी पुरानी कॉमिक टाइमिंग के साथ लौटती है। कुछ कलाकार चेहरे के भावों से हंसाते हैं, कुछ संवादों से और कुछ केवल स्क्रीन पर आते ही मुस्कान ला देते हैं। यह वही किस्म की कॉमेडी है, जहां आपको पंचलाइन से ज्यादा कलाकारों की घबराहट और मूर्खतापूर्ण हरकतें हंसाती हैं।
फिल्म का संगीत और बैकग्राउंड स्कोर भी हर अराजक स्थिति को और ज्यादा अराजक बना देता है। फिल्म में कई कमजोरियां हैं। वीएफएक्स एकदम चलताऊ हैं। कहानी कई जगह भटकती है, कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं और कुछ चुटकुले पुराने जमाने की याद दिलाते हैं। पर दर्शक यहां तर्क नहीं, ठहाके ढूंढने आते हैं।
‘धमाल 4’ वही करती है, जिसके लिए बनी है। दर्शकों को वास्तविक दुनिया की चिंताओं से दूर ले जाकर एक ऐसी दुनिया में पहुंचा देना, जहां हर पांच मिनट में कोई न कोई बेवकूफी होती है और उसी में आनंद छिपा है। इस फिल्म में कमी महसूस हुई. ऐसा लगा कि मानो स्क्रीन पर जो कुछ चल रहा है, उससे आपको कोई मतलब रखने की जरूरत नहीं. दिमाग की वारंटी खत्म हो चुकी हो तो मूंगफली टाइप फिल्म देखने जा सकते हैं। सेन्स ऑफ़ ह्यूमर का क्रिमिनल मिसयूज़ है धमाल 4 फिल्म ! अब आगे धमाल 5 लाने का ऐलान भी है अंत में।
अझेलनीय धमाल 4 नंबर !

डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार



