प्रेजिडेंशियल रेफरेंस पर बोला सुप्रीम कोर्ट-राज्यपाल और राष्ट्रपति को समयसीमा में नहीं बांध सकती कोर्ट, लेकिन राज्यपाल बिल रोक नहीं सकेंगे

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नई दिल्ली। संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की ओर से भेजे गए प्रेजिडेंशियल रेफरेंस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि विधेयकों पर फैसला लेने के लिए अदालत राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया है कि अब कोई भी राज्यपाल किसी बिल को अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रख सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को प्रेसिडेंशियल रेफरेंस मामले में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्यपालों की विधायी शक्तियों को साफ-साफ परिभाषित कर दिया। चीफ जस्टिस बीआर गवई ने स्पष्ट कहा कि राज्यपाल किसी भी बिल को अनिश्चितकाल तक लंबित रखकर नहीं रोक सकते। यह अधिकार न तो संविधान देता है और न ही किसी संवैधानिक व्यवस्था में इसका आधार है.टर्न और राष्ट्रपति के लिए रिज़र्व।

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राज्यपाल के पास केवल तीन विकल्प

अदालत ने अनुच्छेद 200 और 201 का हवाला देते हुए कहा कि किसी बिल पर राज्यपाल के पास केवल तीन ही वैध संवैधानिक विकल्प होते हैं। बिल को मंजूरी देना, बिल को वापस भेजना या बिल को राष्ट्रपति के विचारार्थ भेजना। कुछ राज्यों ने तर्क दिया था कि यदि राज्यपाल एक तय समय तक निर्णय न दें तो बिल को ‘डीम्ड एसेंट’ यानी स्वत: स्वीकृति माना जाए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे अस्वीकार कर दिया। सीजेआई गवई ने कहा कि डीम्ड एसेंट का मतलब होगा कि कोई दूसरी संस्था राज्यपाल की भूमिका ले रही है। यह संवैधानिक व्यवस्था का अधिग्रहण है? राज्यपाल के फैसले की एक निश्चित समय-सीमा तय करने की मांग भी कोर्ट ने खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 200 और 201 में जो ‘लचीलापन’ है, वह संविधान ने सोच-समझकर रखा है। इसलिए अदालत या विधानसभा किसी समयसीमा को राज्यपाल या राष्ट्रपति पर लागू नहीं कर सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल सामान्य परिस्थितियों में बिल को रोककर नहीं रख सकते। यह अधिकार केवल दो विशेष परिस्थितियों में ही प्रयोग किया जा सकता है। जब बिल राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए रिज़र्व करना आवश्यक हो या जब बिल विधानसभा द्वारा पुनर्विचार के लिए वापस भेजा जा रहा हो।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के फैसले में कोर्ट दखल नहीं दे सकता, लेकिन अगर वह अनिश्चित समय तक विधेयक को अपने पास लंबित रखें तो यह कोर्ट के सीमित दखल का आधार बन सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा है कि राज्यपाल या राष्ट्रपति के पास लंबित विधेयक पर कोर्ट विचार नहीं कर सकता। किसी कानून के बनने के बाद ही कोर्ट उस पर विचार कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल विधेयक पर फैसला लेने के लिए मंत्रिमंडल की सलाह मानने के लिए बाध्य नहीं हैं। वह अपने विवेक से बिल को विधानसभा को दोबारा भेज सकते हैं या राष्ट्रपति को विचार के लिए भेज सकते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि संविधान राज्यपाल को असीमित शक्ति देता है। उन्हें मंत्रिमंडल की सलाह को भी ध्यान में रखना चाहिए।

Ardhendu Bhushan - Consulting Editor
Ardhendu Bhushan - Consulting Editorhttp://www.hbtvnews.com
Ardhendhu Bhushan is a senior consulting editor with extensive experience in the media industry. He is recognized for his sharp editorial insight and strategic guidance.

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