इंदौर हाईकोर्ट ने वकील की चूक की वजह से 1093 दिन की देरी पर 50 हजार रुपये की कॉस्ट माफ कर दी। इस आदेश में कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया कि वकील की गलती के कारण पक्षकार को सजा नहीं मिलनी चाहिए।
1093 दिन की देरी का मामला और याचिकाकर्ता की शिकायत
यह मामला इंदौर जिले की देपालपुर तहसील के ग्राम माचल में स्थित 0.169 हेक्टेयर जमीन के विक्रय अनुबंध से जुड़ा है। याचिकाकर्ता दीपक आफले ने धरम डेवलपर्स एंड फिनवेस्ट लिमिटेड के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।
2017 में कंपनी ने याचिकाकर्ता के खिलाफ केस दर्ज कराया था। समन न तामील होने के कारण 24 अगस्त 2017 को एकतरफा कार्रवाई शुरू हुई और 8 अगस्त 2019 को एकतरफा फैसला सुना दिया गया।
वकील की चूक और देरी का कारण
नवंबर 2019 में रिकवरी नोटिस मिलने पर याचिकाकर्ता ने वकील नियुक्त किया। हालांकि, वकील ने एकतरफा आदेश को निरस्त करने के लिए उचित सलाह नहीं दी। बाद में जुलाई 2022 में वह वकील केरल शिफ्ट हो गए।
इसके बाद नए वकील से सलाह लेकर 17 नवंबर 2022 को आवेदन दायर किया गया। इस वजह से लगभग 1093 दिनों की देरी हुई जो कि लगभग तीन वर्षों के करीब है।
निचली अदालतों ने देरी को गंभीर लापरवाही माना
ट्रायल कोर्ट ने 13 अप्रैल 2024 को इस देरी को गंभीर लापरवाही मानते हुए याचिका खारिज कर दी। इसके बाद सत्र न्यायालय ने भी 28 फरवरी 2025 को इसी आधार पर याचिका खारिज की।
निचली अदालतों का तर्क था कि इतनी लंबी देरी से न्यायिक प्रक्रिया बाधित होती है और पक्षकारों को नुकसान होता है।

हाईकोर्ट ने देरी को माफ करते हुए किया पुनर्विचार
इंदौर हाईकोर्ट के जस्टिस विनय सराफ ने 8 अक्टूबर 2026 को दिए फैसले में निचली अदालतों के आदेश रद्द कर दिए। कोर्ट ने कहा कि पक्षकार को अपने वकील की गलती की सजा नहीं मिलनी चाहिए।
इसलिए 1093 दिन की देरी को माफ करते हुए मामला मेरिट पर पुनः सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट को भेज दिया गया।
50 हजार की कॉस्ट लगाने का फैसला
हालांकि, कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 50,000 रुपये की कॉस्ट लगाई है। यह राशि विपक्षी पक्ष को भुगतान करनी होगी। कॉस्ट लगाने का मकसद पक्षकारों को सतर्क करना और प्रक्रिया में अनुशासन बनाए रखना बताया गया।
यह कॉस्ट अदालत की शर्त के रूप में लगाई गई ताकि भविष्य में ऐसी लापरवाही न हो।
वकील की चूक पर न्यायालय की टिप्पणी
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पक्षकार पूरी तरह वकील पर भरोसा करता है तो उसे वकील की गलती के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में न्यायालय सहानुभूति दिखाएगा।
इसके अलावा, इस फैसले से आम जनता को यह संदेश मिलेगा कि वकील की सलाह में चूक के कारण भी उन्हें न्याय से वंचित नहीं किया जाएगा। इससे न्याय प्रणाली में पक्षकारों का विश्वास बढ़ेगा।



