दतिया उपचुनाव में भाजपा की बुरी तरह हार हुई है और कांग्रेस ने यहां कब्जा बरकरार रखा है। अब लोग भले ही कह रहे हों कि दद्दा यानी की पिछली विधानसभा में कांग्रेस से हारे पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट नहीं देने के कारण भाजपा का यह हाल हुआ है, लेकिन इसके कारण अनेक हैं।
जरा सोचिए कि आखिर पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा की लहर के बाद भी खुद को सीएम मटेरियल समझने वाले नरोत्तम मिश्रा चुनाव कैसे हार गए? और जब हार गए तो उसके बाद दतिया की जनता के लिए क्या किया?
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यह तो सबको पता है कि दद्दा का टिकट दिल्ली से कटा था और इसमें पीएम नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की सहमति थी। टिकट कटने का कारणों में दद्दा पर लगे भ्रष्टाचार के आरोप, लोगों से खराब व्यवहार और सीएम की सवारी जैसे कई कारण शामिल हैं। जब बिल्ली के भाग्य से छींका टूटा यानी उपचुनाव की नौबत आ गई, तब दद्दा फिर से ताल ठोंकने लगे।
इधर, पार्टी ने मन बना लिया था कि इस बार दद्दा तो नहीं ही चलेंगे। दूसरी तरफ दद्दा खुद को भाजपा उम्मीदवार मानकर चुनाव प्रचार में भी जुट गए थे, जब टिकट कटा तो दद्दा के साथ ही समर्थकों ने भी आंखें तरेरी। दद्दा ने भी कोशिश की, लेकिन जब लग गया कि कुछ होने वाला नहीं है तो फिर भाजपा उम्मीदवार आशुतोष तिवारी के समर्थन में उतर गए।
फिर भी दद्दा दिल से यह बात स्वीकार नहीं कर पा रहे थे। तभी तो आशुतोष तिवारी के नामांकन में उनकी आंखों से आंसू निकल पड़े। लोग इसे दद्दा समर्थकों के लिए संदेश भी मानते हैं। बाहर से दद्दा भाजपा उम्मीदवार के समर्थन में दिखाई दे रहे थे, लेकिन अंदर ही अंदर एक आक्रोश की एक चिंगारी भी भड़क रही थी कि इस बार पार्टी आलाकमान को सबक सीखा ही देनी है।
दतिया की इस हार से एमपी के दद्दा जैसे उन नेताओं की बांछें जरूर खिली होंगी, जिनसे पार्टी किनारा करना चाहती है। लेकिन, इससे पहले यह समझना होगा कि दतिया में हार की एकमात्र वजह दद्दा को टिकट देना नहीं है। दतिया दद्दा की थी ही नहीं। वो तो कांग्रेस के पास थी और कांग्रेस के पास रहने के दौरान दद्दा ने उस सीट को भाजपा का बनाने की कोशिश भी नहीं की। उल्टा गड्ढा ही खोदते रहे।
ऐसे में दद्दा जैसे नेताओं के आंख तरेरने से कम से कम मध्यप्रदेश में भाजपा को डरने की जरूरत नहीं है। सच तो यह है कि ऐसे नेताओं के कारण ही कई विधानसभा क्षेत्रों में लंबे समय से मेहनत कर रहे कार्यकर्ता अब हताश हो रहे हैं।
भाजपा को तो ऐसे सभी नेताओं को अब मार्गदर्शक मंडल में ही बिठा देना चाहिए और नए लोगों को मौका देना चाहिए। इससे जनता के बीच भी अच्छा संदेश जाएगा और भाजपा के जमीनी कार्यकर्ता भी संतुष्ट होंगे।
खैर, भाजपा इस हार की समीक्षा में जुट गई होगी। प्रदेश अध्यक्ष ने खेल बिगाड़ने वालों के खिलाफ एक्शन का भी ऐलान कर दिया है। जाहिर है कुछ ऐसा होगा, जो आगे के लिए दद्दा टाइप नेताओं के लिए सबक साबित होगा।



