सिमटती डल झील: रिपोर्ट में उजागर हुआ संकट, घटता जल क्षेत्र बना गंभीर चेतावनी 

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भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की ताजा  रिपोर्ट ने डल झील की बिगड़ती हालत को लेकर चिंता बढ़ा दी है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2007 से 2020 के बीच झील का जल क्षेत्र 15.40 वर्ग किलोमीटर से घटकर 12.91 वर्ग किलोमीटर रह गया, जो लगभग 10.15 प्रतिशत की गिरावट को दर्शाता है।

रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि झील में खुले जल और जलमग्न वनस्पति में कमी आई है, जबकि तैरती वनस्पति, खेती, प्लांटेशन और निर्माण गतिविधियों में बढ़ोतरी हुई है। यह बदलाव झील के पारिस्थितिकी तंत्र पर बढ़ते दबाव और मानव हस्तक्षेप की गंभीरता को दर्शाता है।

इस गिरावट के पीछे कई कारण सामने आए हैं, जिनमें प्रदूषण, अतिक्रमण, खराब सीवेज प्रबंधन और कमजोर निगरानी प्रमुख हैं। मीर बेहरी, लाटी मोहल्ला और नंदापोरा जैसे क्षेत्रों में अतिक्रमण के चलते तैरते बागानों और बस्तियों का विस्तार हुआ, जिससे झील का जल क्षेत्र लगातार सिमटता गया।

रिपोर्ट में यह भी उजागर हुआ कि झील संरक्षण और प्रबंधन से जुड़ी एजेंसियां भूमि उपयोग को नियंत्रित करने में विफल रहीं और बदलावों के कारणों का समुचित विश्लेषण नहीं किया गया। भूमि अधिग्रहण में देरी, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स (एसटीपी) का ठीक से काम न करना, खरपतवार हटाने में लापरवाही और निगरानी तंत्र की कमजोरी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया।

चौंकाने वाली बात यह है कि एसटीपी पर 45 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने के बावजूद सीवेज का सही उपचार नहीं हो पा रहा, जिससे झील की जल गुणवत्ता लगातार खराब होती जा रही है। साथ ही 2017 से 2022 के बीच आवंटित सैकड़ों करोड़ रुपये का पूरा उपयोग भी नहीं हो सका।

राष्ट्रीय झील संरक्षण कार्यक्रम और प्रधानमंत्री पुनर्निर्माण कार्यक्रम के तहत चल रही कई परियोजनाएं या तो अधूरी हैं या धीमी गति से चल रही हैं। हाउस बोट्स और स्थानीय निवासियों के पुनर्वास, ठोस कचरा प्रबंधन, सीवर नेटवर्क और होटल स्थानांतरण जैसे महत्वपूर्ण कार्य अपेक्षित स्तर तक पूरे नहीं हो पाए।

रिपोर्ट ने यह भी बताया कि कैचमेंट प्रबंधन के तहत 15 में से केवल 4 माइक्रो-वॉटरशेड पर ही काम हुआ, जिससे संरक्षण प्रयास अधूरे रह गए। संरचनात्मक उपायों, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और निगरानी प्रणाली में भी गंभीर खामियां पाई गईं।

डल झील को श्रीनगर का “लिक्विड हार्ट” बताते हुए रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो झील के जल क्षेत्र और पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और कठिन हो जाएगी।

सीएजी ने सुझाव दिया है कि जल क्षेत्र की नियमित निगरानी, मजबूत प्रबंधन नीति, प्रभावी सीवेज और कचरा प्रबंधन, अवैध निर्माण पर सख्ती और जन जागरूकता अभियान को प्राथमिकता दी जाए। साथ ही योजनाओं के क्रियान्वयन और निगरानी में मौजूद खामियों को दूर करना बेहद जरूरी बताया गया है।

Abhilash Shukla (Editor)
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