किसी शहर को इतना साफ भी नहीं होना चाहिए कि कचरा भी बाहर से बुलाना पड़ जाए…

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भोपाल से यूनियन कार्बाइड का कचरा जब पीथमपुर पहुंचा तो सोशल मीडिया पर लोग इस तरह की टिप्पणी कर रहे थे। भले ही आप इसे मजाक में ले रहे हों, लेकिन गहराई से सोचें तो इसमें जनता का दर्द भी समझ आएगा। आम जनता के मन में सवाल यही है कि अगर यह कचरा जहरीला नहीं है तो फिर इसे इतनी सुरक्षा में भोपाल से पीथमपुर लाकर इस तरह से नष्ट करने की जरूरत क्या है? और अगर यह प्रक्रिया इतनी ही सेफ है तो शायद जिम्मेदार जनता को यह समझा नहीं पाए। इसमें सबसे बड़ी भूमिका जिम्मेदारों की ही मानी जाएगी।

जरा गौर करें तो देखेंगे कि भोपाल से इस कचरे को पीथमपुर लाने की कवायद लंबे समय से चल रही थी। जब फैसला हो गया तो तैयारियों को लेकर भी हर दिन खबरें आती रहीं। तब तक पीथमपुर में विरोध की कोई सुगबुगाहट नहीं थी। जब कचरा पीथमपुर आ गया तो विरोध के स्वर तेज हो गए और इसमें आग तब लग गई जब धार जिले के प्रभारी और इंदौर-महू-पीथमपुर में जबरदस्त राजनीतिक पकड़ रखने वाले एक मंत्री ने बैठक बुला ली। इस बैठक की जरूरत कचरा लाने के बाद क्यों पड़ी, यह समझ से परे है। क्या कचरा जब भोपाल से पीथमपुर लाने की कवायद चल रही थी, तब मंत्री महोदय पीथमपुर जाकर लोगों को समझाइश नहीं दे सकते थे। खुद को हर परिस्थिति को अपने अनुकूल करने का दावा करने वाले लोकप्रिय मंत्री इस मामले में बुरी तरह फेल साबित हुए। अंत में सीएम को हस्तक्षेप करना ही पड़ा।

बड़ा सवाल यह है कि जब सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्देश पर सारे वैज्ञानिक परीक्षणों के बाद यह फैसला लिया गया तो इस पूरी प्रक्रिया के बारे में जनता को क्यों नहीं समझाया गया? वैज्ञानिकों के हवाले से सरकार की तरफ से यह कहा जा रहा है कि यह कचरा हानिकारक नहीं है, अगर ऐसा है तो इसे जनता तक सही तरीके से क्यों नहीं पहुंचाया गया। कम से कम पीथमपुर की जनता को तो समझाया ही जा सकता था।

अब इस विरोध के लिए भले ही विपक्ष को दोषी ठहरा दिया जाए, लेकिन यह भी तो सोचना होगा कि जान की जोखिम की स्थिति में कोई अपने आसपास इस जहरीले कचरे को कैसे डंप होने देगा? अगर आपको ऐसा लगता है कि कांग्रेस या कोई अन्य दल या संगठन लोगों को भड़का रहे हैं, तो आप का फर्ज बनता है कि वहां के लोगों को समझाइए और उनके मन से डर निकालिए।

हम यह नहीं कह रहे कि आप सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना कीजिए, लेकिन जनता के मन में समाए डर को तो निकालना आपका फर्ज बनता ही है। अब सीएम ने कहा कि जनता की बात कोर्ट तक पहुंचाएंगे। कोर्ट क्या फैसला देती है इसी के आधार पर आगे की प्रक्रिया तय होगी।

इसके बावजूद जनता के मन का डर कैसे दूर होगा, इस पर सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। यहां तक कि कोर्ट से भी यह आग्रह किया जाना चाहिए? जब तक जनता के मन का डर दूर न हो तब तक कचरे के निपटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।

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