महाशिवरात्रि विशेष : शिव जी की पत्नियां – सती और पार्वती!

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-डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
बचपन में मां से सुनी थी यह कहानी। यहां शब्द मेरे हैं।
शिव पुराण में माता पार्वती के तप की गहन कथा है। वह तप इतना कठोर था कि देवता भी हैरान रह गए।
…लेकिन इसके पहले सती की कहानी।
प्रजापति दक्ष ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे – बहुत शक्तिशाली, नियम-कायदों के पक्के और सृष्टि के निर्माण में बड़े योगदान देने वाले। उनकी पत्नी के दो नाम थे प्रसूति और वीरणी। उनकी कई पुत्रियाँ हुईं , 24 या उससे ज्यादा, जो बाद में देवताओं, ऋषियों और ग्रहों की पत्नियाँ बनीं। लेकिन दक्ष के मन में एक खास इच्छा थी – एक ऐसी बेटी चाहिए जो सर्वशक्तिमान, विजयी और अलौकिक हो!
उन्होंने भगवती आदिशक्ति की घोर तपस्या की। माँ प्रसन्न हुईं और वरदान दिया – “मैं तुम्हारे घर पुत्री रूप में जन्म लूँगी। मेरा नाम होगा सती (सत्य पर चलने वाली)।”
और हुआ भी वही! सती का जन्म हुआ तो घर में खुशी की लहर दौड़ गई। बचपन से ही सती अलग थीं , अलौकिक तेज, दिव्य गुण। वे छोटी उम्र में ही चमत्कार दिखातीं – फूल हँसते, पक्षी उनके चारों ओर नाचते। दक्ष को गर्व होता, लेकिन अंदर ही अंदर उन्हें डर भी लगता था कि यह बेटी साधारण नहीं है।
सती बचपन से ही भगवान शिव की भक्ति में लीन रहतीं। नारद मुनि या अन्य ऋषियों से शिव की कथाएँ सुनकर उनका मन मोहित हो जाता। वे सोचतीं – “मुझे सिर्फ महादेव चाहिए। कोई और नहीं!”
जब विवाह की उम्र आई, तो दक्ष ने सोचा – मेरी बेटी के लिए कोई राजकुमार, कोई देवता या कोई बड़ा योद्धा ढूँढूँ। लेकिन सती का मन तो पहले से ही कैलाश पर बस चुका था!
दक्ष शुरू में शिव के पक्ष में नहीं थे क्योंकि शिव को वे औघड़, श्मशानवासी, भस्म लगाने वाले समझते थे. शिव मेरी राजकुमारी के योग्य नहीं! लेकिन ब्रह्मा जी ने समझाया “सती आदिशक्ति का अवतार हैं, और शिव आदि पुरुष हैं। इनका मिलन सृष्टि का आधार है।”
आखिरकार दक्ष मान गए। सती और शिव का विवाह हुआ – एक दिव्य, अनोखा विवाह! शिव की बारात में भूत-प्रेत, गण, योगी – सब नाचते-गाते आए। सती खुशी से झूम उठीं। वे कैलाश पर महादेव की अर्धांगिनी बनकर रहने लगीं। दोनों का प्रेम इतना गहरा था कि सृष्टि में संतुलन बना रहा। सती शिव की हर बात मानतीं, और शिव भी सती की भक्ति से पिघल जाते।
सती के पिता राजा दक्ष का अहंकार बढ़ता गया। उन्होंने एक विशाल यज्ञ किया। सारे देवता आए, लेकिन जानबूझकर शिव और सती को न्योता नहीं दिया। सती को जब पता चला, तो वे बिना बुलाए यज्ञ में गईं। वहाँ दक्ष ने शिव का अपमान किया – “वो योगी मेरे जामाता? कभी नहीं!”
सती का हृदय टूट गया। पिता का अपमान सहन नहीं हुआ। उन्होंने यज्ञ की अग्नि में कूदकर देह त्याग दी – ”मैं ऐसे पिता की बेटी नहीं रह सकती जिसने मेरे स्वामी का अपमान किया!”
यह सुनकर शिव का क्रोध फूट पड़ा। उन्होंने तांडव किया, वीरभद्र को उत्पन्न किया और यज्ञ को तहस-नहस कर दिया। लेकिन सती का त्याग अमर हो गया।
◾◾◾
सती के देह त्याग के बाद पार्वती हिमालय राज की पुत्री के रूप में जन्मीं। बचपन से ही उनका मन शिव में रमा था। देवर्षि नारद ने उन्हें बताया कि शिव को पाने के लिए घोर तप जरूरी है।
पार्वती ने माता-पिता से आज्ञा ली, सारे आभूषण, रेशमी वस्त्र, सौंदर्य के साधन त्याग दिए। वे जंगल के तपोवन में चली गईं। स्नान कर, तपस्वी वेष धारण किया–सादा वस्त्र, जटा बाँधे, कोई सजावट नहीं।
उन्होंने “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप शुरू किया – मन, वाणी और कर्म से सिर्फ शिव का चिंतन।
शुरुआत में वे फल-फूल खातीं। जंगल के फल, पत्ते, जड़ें – जो मिले, वही। तीनों समय शिवलिंग (या ध्यान में शिव) की पूजा करतीं – फूल चढ़ातीं, जल अर्पित करतीं।
फिर पत्ते भी त्याग दिये । सिर्फ जल पीकर रहने लगीं।
बाद में जल भी छोड़ दिया। सिर्फ हवा और ध्यान।
शरीर कंकाल-सा हो गया – हड्डियाँ दिखने लगीं, त्वचा झुर्रीदार, लेकिन आँखों में शिव की ज्योति चमकती रही।
कई वर्षों तक बिना अन्न-जल। वे एक पैर पर खड़ी रहतीं, आँखें बंद, सिर्फ ॐ नमः शिवाय का जप। वर्षा में भीगतीं, सर्दी में बर्फ में लेटतीं, गर्मी में धूप में खड़ी रहतीं। जंगली जानवर आते, लेकिन उनकी भक्ति से वे शांत हो जाते। एक बार एक व्याघ्र (शेर) आया, लेकिन पार्वती की करुणा से वह उनका रक्षक बन गया!
उनकी तपस्या इतनी तेज हो गई कि तीनों लोक संतप्त हो उठे। देवता, असुर, ऋषि – सब कष्ट में पड़ गए। तप की अग्नि से ब्रह्मांड गर्म होने लगा।
कामदेव का प्रयास – देवताओं ने कामदेव को भेजा। उन्होंने फूलों की बौछार, सुंदर दृश्य से शिव को मोहित करने की कोशिश की। लेकिन शिव ने तीसरी आँख खोलकर उन्हें भस्म कर दिया। पार्वती नहीं डरीं – वे और गहराई में उतर गईं।
शिव की परीक्षा – शिव ने कई बार ब्राह्मण के रूप में आकर उनकी परीक्षा ली। एक बार पूछा – “तुम इतनी सुंदर हो, फिर यहाँ क्यों?” पार्वती ने जवाब दिया – “मेरा पति सिर्फ शिव हैं।”
एक बार उन्होंने शिव को बदनाम करने की कोशिश की (जैसे वे भूत-प्रेतों के साथ रहते हैं), लेकिन पार्वती ने क्रोध में कहा – “मेरे स्वामी की निंदा मत करो!” शिव प्रसन्न हुए, लेकिन अभी प्रकट नहीं हुए।
देवताओं की प्रार्थना – ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र सब शिव के पास गए। बोले – “त्रिलोकी जल रही है। पार्वती की तपस्या से सृष्टि खतरे में है।” शिव मुस्कुराए और बोले – “उसकी भक्ति सच्ची है। मैं प्रसन्न हूँ।”
आखिरकार शिव प्रकट हुए – भस्म लगाए, जटा बिखरी, लेकिन आँखों में अपार करुणा।
वे बोले – “उमा… तुम्हारी भक्ति ने मुझे जीत लिया। तुम मेरी अर्धांगिनी बनो।”
पार्वती की आँखें आँसुओं से भर गईं। सालों का इंतज़ार, त्याग, कष्ट – सब फल दिया। शिव ने उन्हें उमा, गौरी, अंबिका जैसे नाम दिए।
पुराणों में कहा गया है कि पार्वती ने हजारों वर्ष तक तप किया। लेकिन समय से ज्यादा महत्वपूर्ण था उनका एकनिष्ठ प्रेम।
यह तपस्या सिखाती है:
– सच्चा प्रेम त्याग और धैर्य माँगता है।
– भक्ति में कोई बाधा नहीं – चाहे शरीर टूट जाए, मन नहीं टूटता।
– शक्ति बिना शिव के अधूरी, और शिव बिना शक्ति के शांत।
हर हर महादेव!
जय माता पार्वती!

Ardhendu Bhushan - Consulting Editor
Ardhendu Bhushan - Consulting Editorhttp://www.hbtvnews.com
Ardhendhu Bhushan is a senior consulting editor with extensive experience in the media industry. He is recognized for his sharp editorial insight and strategic guidance.

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