इंदौर। भाजपा नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा अब धीरे-धीरे फॉर्म में आने लगे हैं। मुख्यमंत्री द्वारा ताजपोशी की जिद भी पूरी हो गई है। इस बीच लगातार उनकी तरफ से खुद को निर्गुट यानी बिना किसी गुट का साबित करने की कोशिश भी हो रही है। अब सबसे बड़ी परीक्षा है नगर की टीम बनाना। इसमें उन्हें इंदौर के सभी विधायकों के साथ ही मंत्री गुट का बाउंसर भी झेलना पड़ेगा। अब सवाल यह है कि आखिर वे अपनी छवि बचाएंगे या मंत्री गुट से पुराना संबंध निभाएंगे।
उल्लेखनीय है कि भाजपा नगर अध्यक्ष और जिला अध्यक्ष की नियुक्ति में जिस तरह मंत्री गुट ने खींचतान की, उसकी खबर दिल्ली तक पहुंची। विवाद इतना बढ़ा कि इंदौर में सबसे देर से घोषणा हो पाई। अगर विधायक रमेश मेंदोला और गोलू शुक्ला साथ नहीं देते तो सुमित मिश्रा के हाथ से कुर्सी खिसक ही रही थी। जिले में दूसरे मंत्री को पटकनी देते हुए दो नंबर के मंत्रीजी अपने समर्थक को अध्यक्ष बना ही लाए। सुमित मिश्रा को भी दो नंबर के खाते का ही माना जाता रहा है। हालांकि वे संतुलन बनाकर चलने की कोशिश कर रहे हैं, इसीलिए सीएम के हाथों अपनी ताजपोशी के लिए अड़े रहे।
मंत्री गुट हर विधानसभा में अड़ाएगा टांग
जैसा कि मंत्री गुट की फितरत है, वह हर विधानसभा में टांग अड़ाने की कोशिश करेगा। विधानसभा एक और दो में तो उनके बगैर पत्ता हिलने का सवाल ही नहीं है, लेकिन तीन नंबर में भी परेशानी कम नहीं है। पूर्व विधायक आकाश विजयवर्गीय यहां का मोह छोड़ नहीं पा रहे। यही वजह है कि विधायक गोलू शुक्ला यहां अपनी टीम नहीं खड़ी कर पाए। अब वे भी सुमित मिश्रा से आस लगाकर बैठे हैं। मंत्री गुट यह नहीं चाहता कि गोलू शुक्ला का कद बढ़े, ऐसे में सुमित मिश्रा क्या कर पाते हैं देखने योग्य होगा। हां, इतना तय है कि रमेश मेंदोला दो नंबर के अलावा कहीं हस्तक्षेप नहीं करेंगे, क्योंकि वे अब किसी विवाद में नहीं पड़ना चाहते।
चार और पांच नंबर में भारी टसल
मंत्री गुट विधानसभा चार में लगातार घुसने की कोशिश करता है, लेकिन विधायक मालिनी गौड़ उन्हें फटकने नहीं देतीं। इसके बावजूद नगर निगम चुनाव से लेकर मंडल अध्यक्ष तक की नियुक्ति में मंत्री गुट अपनी टांग फंसा ही देता है। पांच नंबर में विधायक बाबा यानी महेंद्र हार्डिया एलास्टिक की तरह हैं। वे अपने कुछ कार्यकर्ताओं को एडजस्ट करने के साथ ही दूसरे नेताओं के कार्यकर्ता पर भी राजी हो जाएंगे।
राऊ में महापौर और जिराती से घिरे मधु भैया
राऊ के विधायक मधु वर्मा की तो अजीब ही स्थिति है। वहां महापौर पुष्यमित्र भार्गव और मंत्री गुट के खास पूर्व विधायक जीतू जिराती उन्हें घेर कर बैठे हैं। ऐसे में मधु वर्मा शायद ही उनसे भिड़ने की कोशिश करें। ऐसे में यहां भी मंत्री गुट अपनी दाल गलाने में सफल हो सकता है। सांसद शंकर लालवानी के बारे में कहा जाता है कि उन्हें सिर्फ अपने खास समर्थकों की ही चिन्ता रहती है, इसलिए वे अपने कुछ समर्थक एडजस्ट कराने के अलावा किसी और तरह का हस्तक्षेप नहीं करेंगे।
सिर्फ चुनाव की जिम्मेदारी ही क्यों निभाएं विधायक
जब भी महापौर और सांसद का चुनाव होता है तो सारे विधायकों को जिम्मेदारी दे दी जाती है। चंदा जुटाने से लेकर वोट दिलाने तक के लिए उन्हें ही जिम्मेदार माना जाता है। ऐसे में एक बड़ा सवाल यह है कि जब टीम बनती है तो उनकी विधानसभा में किसी दूसरे का हस्तक्षेप क्यों होने दिया जाता? यहां बड़ा सवाल यह भी है कि जब दूसरे विधानसभा के विधायक मंत्रीजी के क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करते तो फिर मंत्रीजी को क्यों घुसपैठ करने दिया जाता है? नगर अध्यक्ष सुमित मिश्रा इन सब हालातों से वाकिफ हैं, अब देखना यह है कि इन सारे झंझावातों के बीच से वे अपनी नैया किस कुशलता के साथ निकाल पाते हैं।


