जब चाट-पकौड़ों से ही है सराफा की पहचान…फिर सोने-चांदी की दुकानों का क्या काम?

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इंदौर के सराफा बाजार से खानेपीने की दुकानों को लेकर पिछले लंबे समय से विवाद चल रहा है। सोनेचांदी की दुकानों की सुरक्षा को लेकर कई बार सवाल उठे हैं। चूंकि खानेपीने की दुकानों में रसोई गैस सिलेंडर का इस्तेमाल होता है, इसलिए बारबार सुरक्षा की बात कही जाती है। सराफा व्यापारी इन खानेपीने की दुकानों का लगातार विरोध कर रहे हैं, लेकिन महापौर पुष्यमित्र भार्गव इन्हें हटाना नहीं चाहते।

हाल ही में व्यापारियों के साथ हुई बैठक में महापौर भार्गव ने स्पष्ट कह दिया कि सराफा चौपाटी इंदौर की पहचान है, इसे हटाया नहीं जा सकता। महापौर के इस फैसले के खिलाफ अब सराफा व्यापरियों ने रात 10 बजे तक अपनी दुकानें खुली रखने का निर्णय लिया है। इससे साफ जाहिर है कि इस बार व्यापारी आरपार की लड़ाई के मूड में हैं।

महापौरजी जरा सोचिए, इंदौर शहर में खानेपीने के ठिए कम नहीं हैं और अगर कम भी लग रहे हैं तो छप्पन जैसे कुछ अन्य स्थान विकसित किए जा सकते हैं। एक बात और सराफा में दोपहिया वाहन लेकर दिन में भी चलना मुश्किल होता है, शाम को पैदल चलने में भी पसीने छूट जाते हैं। महापौरजी आपके जैसे वीआईपी जब सराफा में चाटपकौड़े का आनंद लेने जाते हैं, तो आम आदमी की जो दुर्गति होती है वह बयान करने लायक नहीं। हालत तो यह है कि अब इंदौर के ही लोग भीड़ के कारण सराफा जाना पसंद नहीं करते। दुकानों की संख्या भी इतनी बढ़ गई है कि अब क्वालिटी के साथ खूब समझौते हो रहे हैं।

अगर सचमुच महापौरजी को इंदौर शहर के लोगों के खानेपीने की चिन्ता है तो राजवाड़ा के आसपास ही कहीं अन्य जगह चौपाटी विकसित क्यों नहीं कर देते? नगर निगम की नाकामी के कारण ही पूरे शहर में बेतरतीब सी चौपाटियां विकसित हो रही हैं। महापौरजी, इन्हें व्यवस्थित करने की चिन्ता क्यों नहीं कर लेते?

इसके बाद भी अगर आपको लगता है कि सराफा की पहचान चाटपकौड़ों की दुकान ही हैं तो सोनेचांदी की दुकानें हटवा दीजिए।

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