कर्मचारीगण गृह निर्माण संस्था में हुए फर्जीवाड़े की तथ्यों सहित सहकारिता मंत्री से शिकायत, उपायुक्त जायसवाल की वरीयता सूची पर रोक लगाने की मांग

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इंदौर। कर्मचारीगण गृह निर्माण सहकारी संस्था में वरीयता सूची को लेकर लंबे समय से फर्जीवाड़ा चल रहा है। सहकारिता विभाग से लेकर आईडीए के अफसर मिलकर पूरा खेल जमा रहे हैं। ऐसे में संस्था के सदस्य बालेश चौरसिया ने सहकारिता मंत्री से तथ्यों सहित शिकायत की है। चौरसिया ने प्लॉट आवंटन तथा रजिस्ट्री पर तत्काल रोक लगाने की मांग की है। इस शिकायत में सीधे-सीधे उपायुक्त मनोज जायसवाल को दोषी ठहराया गया है। अब इस खेल में इंदौर विकास प्राधिकरण के विधि एवं भू अर्जन अधिकारी सुदीप मीणा भी शामिल हो गए हैं। सुदीप मीणा ने मनोज जायसवाल की विवादित वरीयता सूची को ही सही करार देते हुए डिमांड निकालकर सहकारिता विभाग को भेज दी।

चौरसिया ने अपनी शिकायत में संस्था के अध्यक्ष आरडी शेगांवकर पर गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायत में कहा गया है कि संस्था के 80 सदस्यों की सूची इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) को 22 मार्च 2004 को सौंपी गई थी। संयुक्त रजिस्ट्रार ने वह सूची भेजी थी। इसके बाद 23 दिसंबर 2004 को 65 सदस्यों की वरीयता सूची सत्यापित करते हुए संयुक्त आयुक्त कार्यालय इन्दौर को प्रेषित की गई थी। उस समय वर्तमान में अध्यक्ष आरडी शेगांवकर संस्था में किसी भी पद पर पदस्थ नहीं थे। उस समय संस्था में प्रभारी अधिकारी नियुक्त थे। संस्था के विरूद्ध शिकायत मिलने पर वरिष्ठ सहकारी निरीक्षक प्रमोद तोमर ने 15 दिसंबर 2020 को अंतिम प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था। इसमें तत्कालीन अध्यक्ष शेगांवकर द्वारा वरीयता सूची से छेड़छाड़ करने के कारण इसे धोखाधड़ी का प्रकरण माना गया था। इसके बाद एपीएस विलोदिया अंकेक्षण अधिकारी द्वारा संस्था का वर्ष 2002-03 का विशेष अंकेक्षण 16 नवंबर 2020 को प्रस्तुत किया गया था, जिसमें यह स्पष्ट उल्लेखित किया गया था शेगांवकर द्वारा गलत जानकारी प्रस्तुत कर विभाग को गुमराह करते हुए वास्तविक सदस्यों के स्थान पर अन्य को भूखण्ड प्रदान करने का प्रयास किया गया है।

शेगांवकर पर होनी थी कार्रवाई

सदस्यों द्वारा हाईकोर्ट के समक्ष संस्था की गंभीर अनियमिताओं को लेकर याचिका प्रस्तुत की गई थी। इसके निर्देशानुसार संयुक्त आयुक्त द्वारा 11 फरवरी 2014 को जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया था। इस प्रतिवेदन में जांच निष्कर्ष अनुसार तत्कालीन अध्यक्ष आरडी शेगांवकर के विरूद्ध कार्यवाही किए जाने के लिए प्रतिवेदन प्रस्तुत किया था।

हर ऑडिट में मिली थी अनियमितताएं

संस्था का वर्ष 2002-03 से लेकर वर्ष 2008-09 तक अंकेक्षणों के संबंध में विशेष अंकेक्षण की कार्यवाही/आदेश होने पर वर्ष 2002-03 से लेकर वर्ष 2008-09 तक द्वितीय अंकेक्षण हेतु जीएस भाटिया अंकेक्षण अधिकारी को नियुक्त किया गया था। भाटिया द्वारा वर्ष 2002-03 से लेकर वर्ष 2008-09 तक द्वितीय विशेष अंकेक्षण किया गया। तद्नुसार तत्कालीन सहायक पंजीयक द्वारा वर्ष 2002-03 से लेकर वर्ष 2008-09 की विशेष अंकेक्षण टीपों को क्वालिफाई मानकर अंकेक्षण निर्गमित करते हुए आदेश पारित किया गया था। वर्ष 2002-03 से लेकर वर्ष 2008-09 तक के विशेष अंकेक्षण में संस्था के क्रियाकलापों में गंभीर अनियमितताएं मिली थीं।

शेगांवकर ने ऑडिट को दी थी चुनौती

28 अप्रैल 17 को निर्गमित अंकेक्षण टीप आदेश को आरडी शेगांवकर द्वारा न्यायालय पंजीयक सहकारी संस्थाएं भोपाल के समक्ष चुनौती दी गई थी। न्यायालय पंजीयक सहकारी संस्थाएं भोपाल ने 15 दिसंबर 2019 को आदेश पारित कर निर्गमित टीप वर्ष 2003 से लेकर वर्ष 2008 को यथावत रखा था। संस्था द्वारा उक्त आदेश को अधिकरण के समक्ष चुनौती दी गई। अधिकरण द्वारा 24 मार्च 2025 को आदेश पारित कर न्यायालय पंजीयक का आदेश निरस्त कर पुनः न्यायालय पंजीयक को गुण दोषों पर प्रकरण का निराकरण करने हेतु आदेशित किया गया। संस्था की निगरानी न्यायालय पंजीयक के समक्ष वर्तमान में विचाराधीन है।

तथ्यों को छुपा कर जमाया गया खेल

इसके बाद संस्था ने तथ्यों को छुपाकर सदस्य राजीव पिता रमणीक सिंह कुशवाह के माध्यम से एक निगरानी पुनः न्यायालय पंजीयक सहकारी संस्था के समक्ष वर्ष 2002-03 से लेकर 2008-09 के निर्गमित अंकेक्षण टीपों को चुनौती देते हुए प्रस्तुत करवाई गई। उपरोक्त कार्यवाही सदस्य एवं संस्था द्वारा संगनमत होकर की गई थी। पंजीयक द्वारा उक्त निगरानी को संयुक्त पंजीयक सहकारी संस्था उज्जैन संभाग उज्जैन के यहां अंतरित की गई। संयुक्त पंजीयक उज्जैन द्वारा 25 मई 2025 को आदेश पारित कर वर्ष 2002-03 से लेकर वर्ष 2008-09 की निर्गमित टीप आदेश दिनांक 28 अप्रैल 2017 निरस्त किया गया।

शिकायत में हाईकोर्ट की याचिका का हवाला

शिकायत में कहा गया है कि राज्य सहकारी अधिकरण द्वारा निगरानी क्र. 157/2019 में पारित आदेश 24 मार्च 2025 एवं संयुक्त आयुक्त सहकारी संस्थाएं उज्जैन संभाग द्वारा पारित आदेश 20 मई 2025 को चुनौती देते हुए संस्था के पूर्व प्रबंधक सुरेन्द्र सिंह सिद्धू ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। उक्त याचिका पर हाईकोर्ट ने 30 अक्टूबर 25 आदेश पारित कर निगरानी प्रकरण क्र. 157/2019 (माननीय राज्य सहकारी अधिकरण द्वारा पारित आदेश दिनांक 24.03.2025) एवं निगरानी प्रकरण क्र. जे.आर.यू.जे.एन 80-ए/2024-25/006 संयुक्त पंजीयक सहकारी संस्थाए उज्जैन द्वारा 25 मई 2025 पारित आदेश को स्थगित किया गया। उपरोक्त याचिका माननीय उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित होकर विचाराधीन है।

ईओडब्ल्यू भी कर रहा है गड़बड़ियों की जांच

कर्मचारीगण गृह निर्माण सहकारी संस्था की अनियमितताओं के संबंध में जांच आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ ईकाई (ईओडब्ल्यू) भोपाल में चल रही है। संस्था द्वारा अवैधानिक रूप से वरीयता सूची जो प्राधिकरण को उपायुक्त इन्दौर के माध्यम से वर्तमान में प्रेषित की गई थी। उसके संबंध में भी संयुक्त आयुक्त सहकारिता एवं पंजीयक सहकारी संस्थाएं इन्दौर संभाग इन्दौर द्वारा पत्र क्र/गृह/1445 10 अक्टूबर 2025 के अनुसार लेख किया गया है कि प्रेषित वरीयता सूची मूलतः आवश्यक कार्यवाही हेतु इस निर्देश के साथ प्रेषित की गई कि बिन्दुओं का पालन कर अनुपालन प्रतिवेदन के साथ पुनः वरीयता सूची नियमानुसार प्रेषित की जाए। उपायुक्त महोदय को परिपत्रों के आलोक में कोई एकजई रूप से वरीयता सूची प्राधिकरण को प्रेषित करने का अधिकार नहीं है। पंजीयक के परिपत्र क्र. गृह/11/1061 भोपाल 19 अक्टूबर 2011 में स्पष्ट लिखा है कि गृह निर्माण सहकारी संस्था के संबंध में इन्दौर विकास प्राधिकरण के संकल्प 09 व 232 के अन्तर्गत भूखण्ड आवंटन हेतु वरीयता सूची का सत्यापन, परीक्षण, संयुक्त आयुक्त सहकारिता इन्दौर के माध्यम से करवाकर ही प्राधिकरण को भेजेंगे।

उपायुक्त ने मनमाने तरीके से भेज दी सूची

शिकायत में कहा गया है कि उपायुक्त ने संस्था के पदाधिकारियों से मिलीभगत कर सारे तथ्यों की अनदेखी करते हुए नियमों का उल्लंघन कर वरीयता सूची आईडीए को भेज दी। नियमानुसार वरिष्ठ सहकारी निरीक्षकों से सूची का सत्यापन व परीक्षण नहीं कराया गया। इतना ही नहीं यह सूची संयुक्त आयुक्त सहकारिता को प्रेषित न कर परीक्षण न कराते हुए सीधे-सीधे अवैधानिक तरीके से आईडीए को भेज दिया गया।

प्लॉटों का आवंटन और पंजीयन रोका जाए

शिकायत में कहा गया है कि इस वैधानिक सूची को तत्काल रोकते हुए प्लॉटों का आवंटन और पंजीयन पर भी रोक लगाई जाए। अगर ऐसा हुआ तो ऐसे सदस्य जो पूर्व से सदस्य हैं एवं प्रवेश दिनांक के आधार पर भूखंड की पात्रता रखते हैं, वे वंचित रह जाएंगे। ऐसे में संस्था करोड़ों रुपए लेकर अन्य व्यक्तियों को सदस्य बनाकर भूखंड बेचने में सफल हो जाएगी।

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