The story of the fraud in C-21 Business Park : तृष्णा की मृगतृष्णा में भ्रमित रहे सारे विभाग, शुरू से आखिर तक सिर्फ फर्जीवाड़ा

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इंदौर। शहर के रेडिसन चौराहे पर सीना ताने खड़ी पिंटू छाबड़ा की सी-21 बिजनेस पार्क देश में फर्जीवाड़े का सबसे बड़ा उदाहरण है। जिस जमीन पर यह बिल्डिंग खड़ी है उसकी कहानी जलेबी की तरह उलझी हुई है। और इसे उलझाया है शहर के भूमाफियाओं और अफसरों ने। यह बिजनेस पार्क सरकार के ऐसे सारे अभियानों को फेल करता है, जो भूमाफियाओं के खिलाफ चलाए गए हैं। यह सरकार के उन दावों को भी फेल करता है, जिसमें आम जनता को भूमाफियाओं से राहत दिलाने की बात कही जाती है।
उल्लेखनीय है कि सी-21 बिजनेस पार्क की फाइल सभी विभागों में या तो धूल खा रही है या गायब है। इस फर्जीवाड़े पर पर्दा पड़ चुका था। इसी बीच किसी ने गृह मंत्रालय में तृष्णा गृह निर्माण संस्था की शिकायत कर दी। यह वही संस्था है जिसके द्वारा फर्जी तरीके से बेची गई जमीन पर बिजनेस पार्क खड़ा है। जब जांच शुरू हुई तो फाइलों से धूल भी छंटने लगी और गुम हो चुकी एनओसी और अन्य दस्तावेजों की तलाश भी शुरू हुई। सहकारिता विभाग की जांच में यह स्पष्ट हो चुका है कि जमीन की रजिस्ट्री गलत तरीके से कराई गई थी। जिस तृष्णा गृह निर्माण संस्था ने जमीन बेची, उसका पंजीयन भी निरस्त हो चुका है। वह भी उस समय जब पंजीयन निरस्त करने पर रोक था। इसके साथ ही सहकारिता विभाग की जांच में कई अन्य तथ्य भी सामने आए हैं। इसके आधार पर अब आगे की जांच चल रही है।
अब जरा समझते हैं इस जमीन की कहानी
जिस तृष्णा गृह निर्माण संस्था की जमीन पर सी-21 बिजनेस पार्क खड़ा है, उस जमीन का एग्रीमेंट किसान के साथ गम्मूलाल वर्मा ने किया। एग्रीमेंट हो गया, कुछ पैसा भी दे दिया, लेकिन रजिस्ट्री हो नहीं पाई। गम्मूलाल वर्मा ने कहा एग्रीमेंट हो गया लेकिन जमीन पर कब्जा नहीं मिला। फिर किसान ने कहा कि पार्टनरी कर लो, तो गम्मूलाल वर्मा पार्टनर हो गए और एक डीड हो गई।
न एग्रीमेंट रजिस्टर्ड, न जमीन
यहां एक तथ्य बहुत महत्वपूर्ण है कि न तो किसान वाला एग्रीमेंट रजिस्टर्ड है और न ही जमीन की रजिस्ट्री हुई। पचास हजार रुपए दिए गए थे और दो साल में रजिस्ट्री करानी थी, जो आज तक नहीं हुई। अब गम्मूलाल वर्मा ने उसी एग्रीमेंट के आधार पर अपने दोस्त श्रवण वर्मा को पार्टनर बना लिया।
इस सौदे में ऐसे हुई सिद्ध की एंट्री
इसके बाद गम्मूलाल वर्मा और श्रवण वर्मा शहर के ख्यात जमीन के जादूगर बालकुमंद सिद्ध के पास पहुंचे और एक एग्रीमेंट कर लिया। वर्मा ने सिद्ध से कहा कि हमारी 90 हजार वर्गफुट जमीन है। आप बचा हुआ पैसा किसान को दे दो तो हम तीस हजार वर्गुफट जमीन आपको दे देंगे। इसके साथ ही यह तय हुआ कि इस जमीन पर बाउंड्रीवॉल बनवाकर हमारे नाम यानी वर्मा के नाम पर जमीन की रजिस्ट्री करवा दो। बालमुकुंद सिद्ध ने न तो रजिस्ट्री कराई और न बाउंड्रीवॉल बनाई।
सिद्ध को बनवा दिया आम मुख्यतयार
अब एग्रीमेंट के आधार पर वर्मा ने किसान से कहा कि बालमुकुंद सिद्ध को आम मुख्यतयार बना दो। बाकी के पैसे ये दे देंगे। इस तरह सिद्ध बन गए आम मुख्यतयार और 1996 में उन्होंने कुछ जमीन कनकेश्वरी गृह निर्माण संस्था और 1998 में कुछ जमीन तृष्णा गृह निर्माण संस्था को बेच दी। तृष्णा इनकी खुद की सोसायटी थी और वे इसमें अध्यक्ष थे।
तृष्णा ने चुघ को गाइडलाइन से कम में बेची जमीन
सूत्र बताते हैं कि इसके बाद तृष्णा गृह निर्माण संस्था ने पूरी जमीन मोहन चुघ को बेच दी। खास बात यह कि यह जमीन उस समय प्रचलित कलेक्टर गाइडलाइन से कम में बेची गई। इसके बाद चुघ ने फिर यह जमीन बेबीलोन इंफ्रास्ट्र्क्चर को बेच दी। अब सहकारिता विभाग इस बात की भी जांच कर रहा है कि तृष्णा ने कलेक्टर गाइडलाइन से कम में क्यों जमीन बेची।
अब शुरू हुई छाबड़ा की जादूगरी
सूत्र बताते हैं कि जब बेबीलोन को जमीन बेची गई तब इस कंपनी में पिंटू छाबड़ा नहीं थे। जमीन बिकते ही वे इस कंपनी के सर्वेसर्वा हो गए। इसके बाद उन्होंने अपनी जादूगरी दिखानी शुरू की और फर्जी अनुमतियों का खेल शुरू हो गया। नक्शा बन गया, विकास अनुमति आ गई और बिल्डिंग खड़ी हो गई।
डायवर्शन में फर्जी अनुमतियां लगाई
सूत्रों के अनुसार जब मामले की जांच शुरू हुई तो डायवर्शन में भी फर्जीवाड़े का पता चला। वर्ष 2002 के डायवर्शन आदेश में कहा गया है कि एसडीएम ने पत्राचार किया तो आईडीए ने 1998 में बताया कि यह जमीन हमारे किसी स्कीम में नहीं है। 1998 के बाद का कोई कागज नहीं है, लेकिन जमीन का डायवर्शन 2002 में हो गया। जबकि आईडीए की एनओसी 2002 की होनी चाहिए थी। यह भी एक बड़ा फर्जीवाड़ा है। खास बात यह कि आईडीए की जिस एनओसी की बात की जा रही है, वह आईडीए के रिकॉर्ड में ही नहीं है। यह जानकारी खुद आईडीए ने ही सूचना के अधिकार के तहत दी है।
जांच में अभी और परतें खुलेंगी
जैसे-जैसे मामले की जांच आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे सहकारिता विभाग की जांच में कई नए बिंदु शामिल होते जा रहे हैं। अब जो नए बिंदु जुड़े हैं, उमें से पहला है कि तृष्णा ने चुघ को कलेक्टर गाइडलाइन से कम में जमीन कैसे बेची? इसके अलावा एक और तथ्य यह सामने आया है की तृष्णा ने बेबीलोन के अलावा भी कुछ जमीन बेची है, जिसकी जांच कलेक्टर भी कर चुके हैं। सहकारिता विभाग भी कर रहा है, लेकिन अभी तक यह मामला पकड़ में नहीं आया है।

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