एस जयशंकर ने होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़े वैश्विक तनाव के बीच नौवें हिंद महासागर सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में क्षेत्रीय सहयोग और साझेदारी को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। इस महत्वपूर्ण मंच पर उन्होंने हिंद महासागर को केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि संसाधनों, संपर्क और संस्कृति से जुड़ा एक साझा पारिस्थितिकी तंत्र बताया।
अपने संबोधन में जयशंकर ने कहा कि हिंद महासागर क्षेत्र के देशों के बीच सहयोग को नई ऊंचाई देना समय की मांग है, क्योंकि किसी भी वैश्विक संकट का प्रभाव इस क्षेत्र पर गहराई से पड़ता है।
👉 यह भी पढ़ें:
- भारतीय फोटोग्राफी के महान सितारे रघु राय का निधन, कैमरे से दुनिया को दिखाया भारत का असली चेहरा
- होर्मुज जलडमरूमध्य में भारतीय टैंकरों पर हमला: भारत का कड़ा विरोध, ईरान ने जताई अनभिज्ञता और शांति की बात
- मिडिल ईस्ट में युद्ध की ज्वाला तेज: कुवैत में ईरानी हमले में भारतीय की मौत, भारी नुकसान
- होर्मुज संकट के बीच राहत: फंसा भारतीय जहाज जग वसंत सुरक्षित भारत पहुंचा
उन्होंने कहा कि क्षेत्रीय संपर्क को पुनर्जीवित करना, आर्थिक संबंधों को मजबूत करना और साझा सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाना बेहद आवश्यक है। इसके साथ ही उन्होंने भौतिक, वित्तीय, तकनीकी और ज्ञान से जुड़े अवरोधों को हटाने की जरूरत पर भी बल दिया, ताकि वैश्विक अर्थव्यवस्था को नई गति मिल सके।
विदेश मंत्री ने ‘वैश्विक दक्षिण’ की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि हिंद महासागर के देशों को मिलकर संघर्ष, संकट और प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना चाहिए। भारत की ‘पड़ोसी पहले’ नीति और ‘दृष्टिकोण महासागर’ इसी सोच को प्रतिबिंबित करते हैं।
उन्होंने “मानसून की भावना” का उल्लेख करते हुए कहा कि एक बिखरी हुई दुनिया में यह भावना हमें एकजुट होकर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। अंत में जयशंकर ने सम्मेलन की सफलता की कामना करते हुए उम्मीद जताई कि यह मंच क्षेत्रीय सहयोग को और मजबूत बनाएगा।


