नई दिल्ली। जले हुए नोट कांड से ख्यात जस्टिस वर्मा को सुप्रीम कोर्ट से तगड़ा झटका लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्मा द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया उन्होंने उनके विरुद्ध लाए गए महाभियोग प्रस्ताव के तहत न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के अनुसार जांच समिति के गठन के लिए लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय को चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद इसे खारिज करते हुए लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया। कोर्ट के इस फैसले के बाद जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रक्रिया के तहत आगे की जांच का रास्ता साफ हो गया है। 8 जनवरी को मामले में जस्टिस यशवंत वर्मा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और लोकसभा सचिवालय की ओर से भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया है। आज शुक्रवार को न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र ने फैसला सुनाया। इससे पहले आठ जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में राष्ट्रपति के कार्यों का निर्वहन कर सकते हैं, तो राज्यसभा के उपसभापति, सभापति की अनुपस्थिति में उनके कार्यों का निर्वहन क्यों नहीं कर सकते?
घर से मिले थे जले हुए नोटों के बंडल
उल्लेखनीय है कि नई दिल्ली स्थित न्यायमूर्ति वर्मा के आधिकारिक आवास पर 14 मार्च को जले हुए नोटों के बंडल मिले थे। इसके बाद उन्हें दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट में ट्रांसफर कर दिया गया था। इस पूरे मामले में सत्ता पक्ष व विपक्ष दोनों तरफ के सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किए जाने की मांग की थी।


