सीडीएस जनरल अनिल चौहान का जोर: युद्ध की नई दिशा में अंतरिक्ष संस्कृति का विकास अनिवार्य

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सीडीएस जनरल अनिल चौहान का जोर: युद्ध की नई दिशा में अंतरिक्ष संस्कृति का विकास अनिवार्य

दिल्ली में आयोजित भारतीय रक्षा अंतरिक्ष संगोष्ठी के तीसरे संस्करण के उद्घाटन समारोह में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने अंतरिक्ष को उभरते युद्ध क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया और “अंतरिक्ष संस्कृति” विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि हम एक ऐसे युग के मुहाने पर हैं, जहां युद्ध भूमि, समुद्र और वायु से आगे बढ़कर अंतरिक्ष तक पहुंच गया है।

अंतरिक्ष युद्ध की ओर बढ़ता भविष्य

जनरल चौहान ने कहा,भविष्य में सेनाओं के पास अपने स्वयं के अंतरिक्ष युद्ध विद्यालय होंगे। जैसे अतीत में समुद्री संस्कृति ने पुर्तगाली, स्पेनिश, डच और अंग्रेजों को वैश्विक ताकत बनाया, और बाद में एयरोस्पेस संस्कृति ने अमेरिका और यूरोपीय देशों को हवा में प्रभुत्व दिलाया, वैसे ही अब अंतरिक्ष युद्ध भविष्य की वास्तविकता बनने जा रहा है।”

उन्होंने स्पष्ट किया कि युद्ध के तीन पारंपरिक क्षेत्र—भूमि, समुद्र और वायु—अब अंतरिक्ष पर निर्भर होने जा रहे हैं। इसलिए, अंतरिक्ष को केवल तकनीकी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से भी समझना जरूरी है।

अंतरिक्ष संस्कृति का महत्व

जनरल चौहान के अनुसार, अंतरिक्ष संस्कृति का अर्थ है:

  • अंतरिक्ष से संबंधित सिद्धांतों और रणनीतियों पर मौलिक शोध
  • अंतरिक्ष कानून और अंतरिक्ष कूटनीति के लिए रूपरेखा तैयार करना
  • स्पेस वॉरफेयर इंस्टीट्यूट्स, अंतरिक्ष लेखन, पत्रिकाएं, और थिंक टैंक्स विकसित करना
  • विचारों की ऐसी पीढ़ी तैयार करना जो अंतरिक्ष क्षमताओं को आकार दे सके

उन्होंने कहा कि विचारों से ही भौतिक क्षमताएं जन्म लेती हैं, इसलिए हमें पहले विचारशीलता और शोध की संस्कृति को विकसित करना होगा।

कल्पना से वास्तविकता की ओर

सीडीएस ने यह भी कहा कि अंतरिक्ष और ब्रह्मांड विज्ञान जैसे विषय हमेशा से आकर्षक और कल्पनाशील रहे हैं। उन्होंने कहा,

हम में से अधिकतर लोग बचपन से अंतरिक्ष यात्रा पर आधारित फिल्मों को देखते हुए बड़े हुए हैं। इनमें कई कल्पना के दायरे में हैं, लेकिन अब वह कल्पना हकीकत बनने की ओर बढ़ रही है।”

जनरल अनिल चौहान ने यह स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष संस्कृति का निर्माण केवल तकनीकी स्टार्टअप से नहीं, बल्कि गंभीर विचार-विमर्श, रणनीतिक सोच और संस्थागत विकास से संभव होगा।

उन्होंने अंत में कहा कि यह समय अंतरिक्ष को केवल एक तकनीकी संसाधन नहीं, बल्कि युद्ध की अगली बुनियादी संरचना के रूप में देखने का है।

Abhilash Shukla (Editor)
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