भारत के चांद पर पहुंचने के बाद भी जाति व्यवस्था की समस्या का जिक्र करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में एक अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि भले ही भारत चंद्रमा के साउथ पोल तक पहुंच चुका है, लेकिन जाति व्यवस्था की बुराई अब भी कायम है।
हाईकोर्ट ने जताई जाति व्यवस्था पर चिंता
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति मंजूषा देशपांडे की खंडपीठ ने जाति व्यवस्था की बुराई पर चिंता जताते हुए कहा कि यह नागरिकों के एक वर्ग को मानवीय गरिमा से नीचे का काम करने पर मजबूर करती है। इस टिप्पणी के साथ ही अदालत ने जातिगत भेदभाव को संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना।
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हाथ से मैला उठाने का मामला
यह मामला हाथ से मैला उठाने और सीवर-सेप्टिक टैंक की सफाई से संबंधित याचिकाओं के दौरान सामने आया। ‘श्रमिक जनता संघ’, श्रेयस पांडे और राजू मढवे की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने महाराष्ट्र सरकार के विवादित शासनादेश को रद्द कर दिया।
विवादित शासनादेश को रद्द किया
महाराष्ट्र सरकार के 12 दिसंबर 2019 के शासनादेश के क्लॉज नंबर 11 को अदालत ने रद्द कर दिया। यह प्रावधान निजी नियोक्ताओं पर मुआवजे की जिम्मेदारी डालता था, जिससे राज्य सरकार अपनी जवाबदेही से बच रही थी।
मुआवजे का नया निर्देश
हाईकोर्ट ने आदेश दिया कि सेप्टिक टैंक या सीवर सफाई के दौरान मृत्यु होने पर मुआवजा राज्य सरकार और स्थानीय निकाय द्वारा तुरंत पीड़ित परिवार को दिया जाएगा। इसके बाद यह राशि नियोक्ताओं से वसूली जाएगी।
आम आदमी पर असर और आगे की राह
इस फैसले से सफाईकर्मियों की सुरक्षा और मुआवजे की प्रक्रिया में सुधार की उम्मीद है। अदालत का यह निर्णय सामाजिक समानता के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। आगे, सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत होगी।



