पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश जस्टिस संजय किशन कौल ने जांच प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि जांच में नकदी आग लगने की वजह स्पष्ट नहीं हो सकी। इस मामले की जांच को लेकर जस्टिस कौल ने सवाल खड़े किए हैं कि आखिर क्यों जज के आवास में आग लगने का सही कारण पता नहीं चल पाया।
जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में हुई घटना
यह विवाद दिल्ली हाईकोर्ट तथा बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के आधिकारिक आवास, 30 तुगलक क्रेसेंट, पर 14 मार्च 2025 को लगी आग से जुड़ा हुआ है। उस दिन आग बुझाने पहुंची दमकल टीम और पुलिस को स्टोर रूम से भारी मात्रा में अधजली और जली हुई ₹500 के नोट मिले थे।
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यह नकदी बरामदगी इस मामले को एक गंभीर भ्रष्टाचार कांड में तब्दील कर गई।

जांच समिति का गठन और उसकी सीमाएं
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव खन्ना ने मार्च 2025 में इस मामले की जांच के लिए तीन जजों की इन-हाउस कमेटी बनाई थी। हालांकि, जस्टिस संजय किशन कौल का मानना है कि इस जांच में कई महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज किया गया।
जांच में यह स्पष्ट नहीं हो सका कि आग कैसे लगी और नकदी के जलने के पीछे की सच्चाई क्या थी। इस कमी ने पूरे मामले की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।
जस्टिस कौल ने जांच की निष्पक्षता पर उठाए सवाल
जस्टिस संजय किशन कौल ने न्यूज एजेंसी ANI को दिए इंटरव्यू में कहा कि जांच सही ढंग से नहीं हुई। उन्होंने कहा कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष और ठोस निष्कर्ष निकालने में विफल रही।
उन्होंने यह भी कहा कि बिना स्पष्ट निष्कर्ष के जस्टिस यशवंत वर्मा का पूरा करियर बर्बाद हो गया।

जस्टिस यशवंत वर्मा का इस्तीफा और संसदीय रिपोर्ट
जांच के बाद विवाद गहराने के चलते जस्टिस यशवंत वर्मा ने 10 अप्रैल 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय संसदीय समिति ने 12 अगस्त 2026 को अपनी रिपोर्ट संसद में पेश की।
रिपोर्ट में पूर्व जज को नकदी का संतोषजनक स्पष्टीकरण न दे पाने का दोषी पाया गया। इस रिपोर्ट ने मामले की गंभीरता को और बढ़ा दिया।
आम आदमी पर इस कांड का प्रभाव
इस तरह के मामलों से न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है, जो आम नागरिक के लिए चिंता का विषय है। जब किसी जज के आवास में ऐसी घटना होती है, तो न्याय व्यवस्था की साफ़गोई पर सवाल उठते हैं।
नतीजतन, आम जनता में न्यायिक मामलों को लेकर अविश्वास बढ़ सकता है, जो लोकतंत्र के लिए हानिकारक है।
क्या निष्पक्ष नहीं हुई है जांच
जस्टिस कौल के आरोपों के बाद अब यह देखना होगा कि न्यायपालिका इस मामले में और अधिक पारदर्शिता कैसे लाती है। अगर जांच पूरी तरह निष्पक्ष नहीं हुई, तो न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए कदम उठाने होंगे।
इसके अलावा, न्यायपालिका में भरोसा बनाए रखने के लिए जांच प्रक्रियाओं में सुधार आवश्यक है।



