राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठन और दृष्टिकोण में हुए बदलावों का विश्लेषण इंदौर में आयोजित बैठक के बाद और अधिक स्पष्ट हुआ। इस तीन दिवसीय अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में संघ के संगठनात्मक विकास और समाज में उसके प्रभाव को लेकर महत्वपूर्ण फैसले लिए गए। शताब्दी वर्ष के दौरान संगठन ने अपनी पहुंच और कार्यशैली में जो परिवर्तन किए, वे संघ की नई दिशा को दर्शाते हैं।
इंदौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अहम बैठक और शताब्दी वर्ष का समापन
2 से 4 नवंबर 2026 तक इंदौर के डेली कॉलेज के संत श्री रविदास महाराज सभागार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वार्षिक अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल बैठक आयोजित हुई। इस बैठक का उद्घाटन सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने किया। इसमें 11 क्षेत्रों और 46 प्रांतों से लगभग 400 शीर्ष पदाधिकारी और प्रतिनिधि मौजूद थे।
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शताब्दी वर्ष के दौरान संघ ने अपनी शाखाओं की संख्या बढ़ाकर 1,01,151 तक पहुंचा दी है। इसके अलावा, गृह संपर्क अभियान के तहत 10.22 करोड़ से अधिक घरों तक पहुंच बनाई गई। इस बैठक में संघ ने अपनी आगामी रणनीतियों पर भी चर्चा की जो संगठन के नए दौर में प्रभावी भूमिका निभाएंगी।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठन में पंच परिवर्तन की शुरुआत
शताब्दी वर्ष के समापन के अवसर पर संघ ने अपने दृष्टिकोण में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत दिया। अब संघ का ध्यान केवल शाखा विस्तार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सामाजिक समरसता, पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली, कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी आचरण और नागरिक कर्तव्य जैसे पांच प्रमुख क्षेत्रों पर केंद्रित हो गया है।
यह पंच परिवर्तन संगठन की व्यवहारिक और स्थायी सामाजिक भूमिका को मजबूत करने का प्रयास है। इससे यह स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अब व्यापक सामाजिक बदलाव के लिए अग्रसर है।
प्रशासनिक पुनर्गठन से संगठनात्मक जिम्मेदारियों में वृद्धि
बैठक में संगठनात्मक ढांचे में भी बदलाव प्रस्तावित किए गए। पुराने प्रांत-आधारित ढांचे के स्थान पर प्रशासनिक संभागों और छोटे जिलों के आधार पर काम करने का निर्णय लिया गया है। इसका उद्देश्य संघ की कार्यकुशलता और पहुंच को और बढ़ाना है।
इस नए ढांचे के तहत संघ के संगठनात्मक जिलों की संख्या लगभग 1,500 से 1,600 तक बढ़ाने की योजना है। उदाहरण के तौर पर मालवा प्रांत को बांटकर इंदौर और उज्जैन संभाग बनाए जाएंगे। यह परिवर्तन स्थानीय स्तर पर संगठन के कार्यों को प्रभावी बनाएगा।

संघ की शाखा संख्या और सामाजिक संपर्क में अभूतपूर्व वृद्धि
शताब्दी वर्ष में संघ ने देश भर में 65,664 हिंदू सम्मेलनों का आयोजन किया, जिसमें लगभग 4.94 करोड़ लोग शामिल हुए। यह संख्या संगठन की सामाजिक पहुंच और सक्रियता का बड़ा प्रमाण है।
इसके अलावा, संघ ने अपने गृह संपर्क अभियान के तहत 10.22 करोड़ से अधिक घरों तक पहुंच बनाई, जिससे सामाजिक जुड़ाव और संगठन की स्वीकार्यता में वृद्धि हुई है। यह आंकड़ा संघ के व्यापक प्रभाव को दर्शाता है।
समकालीन चुनौतियों से निपटने के लिए संघ की रणनीति
बैठक में संघ ने युवाओं में नशे की प्रवृत्ति, न्यू मीडिया की भूमिका, विदेशी हस्तक्षेप और विदेशों में सांगठनिक गतिविधियों जैसे समकालीन सामाजिक मुद्दों पर विचार किया।
संघ ने इन चुनौतियों के समाधान के लिए विशेष रणनीतियां बनायी हैं, जिनमें युवा पीढ़ी (Gen-Z) को सही दिशा देना और संगठन के प्रचार को डिजिटल माध्यमों तक विस्तारित करना शामिल है। यह कदम संघ की भविष्य की सक्रियता को दर्शाता है।
संघ के कानूनी पंजीकरण पर स्पष्टता
अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने स्पष्ट किया कि 1 लाख से अधिक दैनिक शाखाएं चलाने के बावजूद फिलहाल संघ के कानूनी रूप से पंजीकृत होने का कोई प्रस्ताव नहीं है।
यह स्पष्ट करता है कि संघ अभी भी पारंपरिक रूप से एक सामाजिक संगठन के रूप में कार्य करना चाहता है, चुनावी राजनीति से दूरी बनाए रखते हुए अपनी कार्यशैली को जारी रखेगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने 100 वर्षों में अपने संगठन और दृष्टिकोण में जो बदलाव किए हैं, वे उसकी सामाजिक भूमिका और प्रभाव को और भी विस्तारित करते हैं। इंदौर की इस बैठक ने संघ की नई दिशा और योजनाओं को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया है, जो आने वाले वर्षों में भारतीय समाज पर गहरा प्रभाव डालेंगे।



