स्वतंत्रता दिवस विशेष : आजादी के लिए आवश्यक हैं जन आंदोलन

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स्वतंत्रता दिवस विशेष : आजादी के लिए आवश्यक हैं जन आंदोलन

अरुण कुमार डनायक, लेखक व सामाजिक कार्यकर्त्ता

  भारत का ‘स्वतंत्रता दिवस’ अन्याय के विरुद्ध लोकतांत्रिक और अहिंसक संघर्ष की निरंतर जिम्मेदारी का प्रतीक है। भारत की स्वतंत्रता में अनेक धाराओं का योगदान रहा, पर गांधी के अहिंसक आंदोलनों ने जनसामान्य की ललक को व्यापक जनांदोलन में बदल दिया। गांधी के नेतृत्व में असहयोग, ‘दांडी मार्च,’ सत्याग्रह और ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ जनसहयोग से सफल रहे। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ ने शीर्ष नेतृत्व की गिरफ्तारी के बावजूद स्वतंत्रता की निर्णायक चेतना जगाई और ब्रिटिश शासन की नींव हिला दी।

भारत में सामाजिक सुधार आंदोलनों की जड़ें भक्ति आंदोलन में हैं, जब कबीर, नानक और रैदास ने सामाजिक रूढ़ियों व भेदभाव के विरुद्ध जनचेतना जगाई थी, किन्तु आज़ादी के पहले हुए आंदोलनों ने भी जातीय भेदभाव के विरुद्ध संघर्ष को दिशा दी। वर्ष 1927 के ‘महाड सत्याग्रह’ में डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में दलितों ने ‘चवदार तालाब’ से पानी पीकर सार्वजनिक जलस्रोतों पर अपना अधिकार जताया था।

महात्मा गांधी की ‘हरिजन यात्रा’ ने अस्पृश्यता के विरुद्ध जनमत और मंदिर प्रवेश व शिक्षा के अधिकारों के प्रति चेतना जगाई। आजादी के बाद गांधी चाहते थे कि शासन समाज के अंतिम व्यक्ति की आवाज सुने और रचनात्मक कार्यक्रमों को प्राथमिकता दे। संविधान ने नागरिकों को न्यायिक उपचार के साथ शांतिपूर्ण सभा करने और अभिव्यक्ति का अधिकार भी दिया था, लेकिन व्यवस्था की सीमाओं से आकांक्षाएँ पूरी न होने पर लोगों ने आंदोलनों का रुख किया। डॉ. राम मनोहर लोहिया के ‘कांग्रेस हटाओ, देश बचाओ’ और ‘अंग्रेजी हटाओ’ जैसे आंदोलनों ने आजाद भारत में राजनीतिक आंदोलनों को नई धार दी।

राजनीतिक आंदोलनों को पहली बड़ी सफलता छात्रों की भागीदारी से मिली। वर्ष 1973-74 में गुजरात के ‘नव निर्माण आंदोलन’ ने भ्रष्टाचार और महँगाई के विरोध में चिमनभाई पटेल सरकार को इस्तीफा देने पर मजबूर किया। इससे उत्साहित बिहार के छात्रों ने 1974 में जयप्रकाश नारायण से राज्य के कुशासन और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन का नेतृत्व करने का आग्रह किया। बाद में यही आंदोलन इंदिरा गांधी सरकार के विरुद्ध व्यापक जनांदोलन में बदल गया। जेपी ने पटना के गांधी मैदान से ‘संपूर्ण क्रांति’ का आह्वान किया। आंदोलन के दबाव में आपातकाल लगा, विपक्षी नेता जेल गए और प्रेस पर पाबंदियाँ लगीं। यह भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय माना गया। वर्ष 1977 में पहली बार कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुई। लोकतंत्र की पुनर्स्थापना व लोकतांत्रिक सत्ता परिवर्तन हेतु इस आंदोलन का ऐतिहासिक महत्व रहा।

चंडी प्रसाद भट्ट, सुंदरलाल बहुगुणा आदि के नेतृत्व में उत्तराखंड का ‘चिपको आंदोलन’ (1973) जंगलों व पर्यावरण संरक्षण की व्यापक जन चेतना का माध्यम बना। मेधा पाटकर की अगुआई में ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ (1985) ने सरदार सरोवर बाँध से प्रभावित किसानों, आदिवासियों और विस्थापितों के अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया। आंदोलन ने बड़े बाँधों के सामाजिक-पर्यावरणीय प्रभावों पर राष्ट्रीय बहस छेड़ी। बाँध निर्माण रोकने में असफल रहने पर भी आंदोलन ने सरकारों को विस्थापितों के मुआवजे व पुनर्वास के लिए दबाव में बनाया और यह सवाल उठाया कि विकास की कीमत कौन चुकाए तथा प्रभावितों के अधिकार कैसे सुरक्षित हों।

विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार द्वारा ‘मंडल आयोग’ (1990) लागू करने के विरोध में छात्रों का व्यापक आंदोलन हुआ, जिसमें राजीव गोस्वामी सहित कुछ युवाओं ने आत्मदाह का प्रयास किया। ‘मंडल’ के साथ उभरी ‘कमंडल’ की राजनीति ने भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को भी गहरा किया। महिला आंदोलनों ने दहेज जैसी सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाने के साथ स्त्रियों के समान अधिकारों की मांग की। मुस्लिम महिलाओं के आंदोलनों ने गुज़ारा भत्ता, तीन तलाक और ‘नागरिकता संशोधन कानून’ जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श में प्रमुखता दी। श्रमिक आंदोलनों ने न्यायपूर्ण वेतन व श्रमिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया।

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के शुरुआती वर्षों में हुए ‘निर्भया आंदोलन’ ने सरकार को यौन अपराधों के विरुद्ध कड़े कानून बनाने के लिए विवश किया तो अन्ना हजारे के नेतृत्व में चले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने भ्रष्टाचार और लोकपाल के मुद्दे को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। इसके बाद दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ के उभार से लेकर केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार को मिली राजनीतिक चुनौती तक, भारतीय राजनीति में आंदोलनों के प्रभाव का एक नया दौर दिखाई दिया।

आज देश में फिर आंदोलन का माहौल बन रहा है। 2020-21 में तीन कृषि कानूनों के विरुद्ध चला लंबा किसान आंदोलन सरकार को कानून वापस लेने पर विवश कर गया और आंदोलनों की प्रभावशीलता का महत्वपूर्ण उदाहरण बना। इसके बाद ‘काक्रोच जनता पार्टी’ के बैनर तले नई पीढी परीक्षा व्यवस्था की अनियमितताओं और शिक्षामंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर एकत्रित हुई। गांधीवादी सोनम वांगचुक ने आंदोलन के समर्थन में 26 दिन की भूख हड़ताल की।

अंततः 25 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया और सरकार ने आंदोलनकारियों की अन्य मांगें भी स्वीकार कर लीं। ‘जेन जी’ (जनरेशन जी) के आंदोलनों की विशेषता सोशल मीडिया, डिजिटल नेटवर्क और त्वरित जनसंचार का प्रभावी इस्तेमाल है। उनके विकेंद्रीकृत नेतृत्व ने युवाओं को तेजी से जोड़ा, जो पारंपरिक दलों की केंद्रीकृत राजनीति से भिन्न है और भविष्य में दलों की कार्यप्रणाली, चुनावी रणनीतियों व सामाजिक-आर्थिक विमर्श को प्रभावित कर सकता है। ‘जेन जी’ का प्रभाव केवल युवाओं तक सीमित नहीं दिखता; प्रौढ़ मतदाताओं, विशेषकर महिलाओं को प्रभावित करने की उसकी क्षमता सत्तारूढ़ दलों के लिए भविष्य की बड़ी राजनीतिक चिंता बन सकती है।

पूर्ववर्ती आंदोलनों की तरह यह छात्र आंदोलन भी कुछ छिटपुट घटनाओं को छोड़कर शांतिपूर्ण और गांधीवादी सत्याग्रह की तरह अहिंसक रहा तथा व्यवस्था की कमियों को सुधारने के लिए आगे आया। वर्तमान निराशाजनक राजनीतिक माहौल में ‘जेन जी’ के इन निडर युवाओं ने बदलाव की उम्मीद जगाई है। इस आंदोलन ने आलोचकों और प्रदर्शनकारियों को ‘भारत-विरोधी ताकतों से पोषित’ बताने वाली सत्ता पक्ष की पुरानी बयानबाजी की धार भी कुछ कुंद की है।

इस आंदोलन को लेकर कुछ सवाल और आशंकाएँ भी हैं – क्या लड़कियों के लिए भी अभद्र भाषा उतनी ही स्वीकार्य हो सकती है जितनी लड़कों के लिए? क्या सरकार को छात्रों से पहले संवाद नहीं करना चाहिए था? और सबसे बड़ा सवाल – क्या ‘जेन जी’ स्थापित राजनीतिक दलों को पीछे धकेलकर सत्ता तक पहुँच पाएगी? वर्तमान के घाघ राजनीतिज्ञ सोशल मीडिया पर उससे मुकाबला कैसे करेंगे और उसकी अनुभवहीनता भविष्य में शासन के लिए कैसे चुनौती बनेगी?

भारत की स्वतंत्रता का अहिंसक संघर्ष अनेक देशों के लिए उपनिवेशवाद से मुक्ति का उदाहरण बना और गांधी की अहिंसा व सत्याग्रह आज भी अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा है। लोकतंत्र में आंदोलनों का होना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि नागरिक चेतना और शासन को जवाबदेह बनाए रखने की जीवंत शक्ति है। आंदोलनों की परंपरा बताती है कि स्वराज और लोकतंत्र चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिकों की सतत भागीदारी और प्रतिरोध से जीवित रहते हैं। (सप्रेस)

Ardhendu Bhushan - Consulting Editor
Ardhendu Bhushan - Consulting Editorhttp://www.hbtvnews.com
Ardhendhu Bhushan is a senior consulting editor with extensive experience in the media industry. He is recognized for his sharp editorial insight and strategic guidance.

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