जब पूरा शहर कलेक्टर के भरोसे तो बाकी विभागों की जरूरत ही क्या?

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पिछले कुछ समय से यह लगातार देखने में आ रहा है कि कोई भी घटना-दुर्घटना होती है तो दूसरे सभी विभाग बगले झांकने लगते हैं। चाहे किसी बिल्डिंग में आग लग जाए तो फायर विभाग से लेकर अन्य सभी संबंधित विभाग हाथ बांधकर निरीह प्राणी की भांति खड़े हो जाते हैं। चाहे वह बावड़ी हादसा हो या फिर इंडस्ट्री हाउस जैसी बिल्डिंग में आग लगने की घटना हो या फिर देर रात चल रहे पबों में मारपीट और हंगामे का मामला हो, संबंधित विभाग कहीं नजर नहीं आते। हर मामले में कलेक्टर को आगे आना पड़ता है।

ताजा मामला चौराहों पर बिगड़ रही ट्रैफिक व्यवस्था और बेसमेंट में चल रहे कोचिंग सेंटरों का है। शहर के लगभग अधिकांश चौराहों पर नगर निगम काम कर रहा है। इनमें मधुमिलन सहित कई चौराहों क गुत्थी आज तक सुलझ नहीं पाई। शहर में जगह-जगह ट्रैफिक जाम होता है, इसमें यातायात विभाग और नगर निगम की कोई जिम्मेदारी नहीं। इसकी जिम्मेदारी भी कलेक्टर के सिर है।

जब दिल्ली के कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में हादसा हुआ, तब देश के अन्य शहरों के साथ अपने इंदौर में भी कार्रवाई शुरू हो गई। कलेक्टर के निर्देश पर जिला प्रशासन और नगर निगम के अमले ने जांच शुरू कर दी। यहां भी नगर निगम बेचारा बना रहा, जैसे उसे पता ही नहीं कि किस-किस बिल्डिंग की बेसमेंट में पार्किंग की जगह अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चल रही हैं। निगम का अमला प्रशासन के साथ भोला बन घूमता रहा।

कलेक्टर आशीष सिंह को जब वस्तुतिथि पता चली तो वे भी चकरा गए। उन्होंने तत्काल चेतावनी दे डाली कि अब बेसमेंट का उपयोग सिर्फ पार्किंग के लिए होगा। इसके लिए भवन संचालकों को एक माह का समय दिया जाएगा। बेसमेंट में यदि अन्य उपयोग किया जा रहा हो तो भवन मालिक एक माह में खुद ही हटा लें अन्यथा रिमूव्हल की कार्रवाई की जाएगी।

अब यहां सवाल यह है कि कार्रवाई करेगा कौन? कार्रवाई की जिम्मेदारी तो उन्हीं के पास जिन्होंने बेसमेंट में पार्किंग की जगह व्यावसायिक गतिविधियां चलने दी। जिन्होंने नक्शा पास किया। बिल्डिंग बनते समय माह में दो-चार बार वहां जाते रहे। बिल्डिंग बनने के बाद पूर्णता प्रमाणपत्र के लिए उसकी जांच करने भी गए। प्रमाणपत्र दिया या नहीं यह अलग बात है।

कलेक्टर साहब, इसमें सिर्फ भवन मालिकों की ही गलती नहीं है। अगर आप शहर को ऐसे हादसों से सचमुच बचाना चाहते हैं तो पहले इन अधिकारियों पर नकेल कसिए?

जिन बिल्डिगों को आपने चिन्हित किया है, मंगाइए उस इलाके के भवन अधिकारियों व भवन निरीक्षकों की सूची। किन-किन अधिकारियों के संरक्षण में वह बिल्डिंग बनी, किसने नक्शा पास किया सब पर कार्रवाई कर डालिए।

अगर आप ऐसा कर देते हैं तो यह समस्या जड़ से खत्म हो जाएगी। आप जब से आए हैं, शहर में अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन हर काम में आपको ही खड़ा होना पड़े यह ना तो उचित है और ना ही संभव। ऐसा इलाज कर जाइए कि नासूर खत्म हो जाए और शहर आपको हमेशा याद रखे।

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