मध्यप्रदेश में मोहन सरकार के एक साल…आसान नहीं था तूफां से कश्ती को निकाल लाना

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भोपाल। मध्यप्रदेश में डॉ.मोहन यादव को सत्ता संभाले एक साल पूरे हो गए हैं। जब अचानक उनका नाम सीएम के पद के लिए आया, तो भाजपा के कई दिग्गज विचलित हो गए थे। लाडली बहना के दम पर बंपर जीत के बाद शिवराज सिंह चौहान को भी फिर से गद्दी की उम्मीद थी। दिल्ली से मध्यप्रदेश वापस आए कई दिग्गज भी उम्मीद से थे। उस समय कहा गया, लोकसभा चुनाव तक यादव वोट में पकड़ बनाने के लिए भाजपा ने यह फैसला लिया है। कई वरिष्ठ नेता कहते रहे कि एक साल भी मोहन यादव नहीं चल पाएंगे, लेकिन उन्हें तब निराशा हाथ लगी जब न केवल सरकार अच्छे से चली बल्कि प्रदेश के विकास की रफ्तार ने भी गति पकड़ ली।

मोहन यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने ही लोगों से निपटने की थी। उन्होंने धीरे-धीरे संगठन पर पकड़ बनानी शुरू की। भाजपा में छाए असंतोष को दूर किया। वैसे विधायकों और नेताओं को पूछना शुरू किया जो उपेक्षित महसूस कर रहे थे। इंदौर जैसी जगह जहां कुछ लोग सत्ता ही नहीं संगठन को भी अपनी बपौती समझने लगे थे, उसे संतुलित किया। जब देखा कि इंदौर में काफी कुछ बिगड़ रहा है, तब जिले का प्रभार भी अपने पास रख लिया। इसका नतीजा यह हुआ कि इंदौर के विकास की बाधाएं भी खुद ब खुद दूर होने लगीं। शहर को कई फ्लाईओवर की सौगात के साथ ही बीआरटीएस हटाने के फैसले में भी एक पल की भी देरी नहीं लगाई।

सत्ता और संगठन पर ऐसे बनाई पकड़

संगठन से निपटने के बाद डॉ.यादव ने सत्ता पर पकड़ बनानी शुरू की। चाहे वह सीएस की नियुक्ति हो या फिर डीजीपी की। ऐसे अफसरों को लाने में सफल रहे जो सीएम के विकास के विजन के साथ कदमताल कर सकें। धीरे-धीरे उन्होंने मंत्रालय को अपने हिसाब से सेट कर लिया। इसके बाद जिलों में भी काम करने वाले ईमानदार अफसरों की तैनाती की जाने लगी। अब स्थिति यह है कि चाहे सत्ता हो या संगठन सीएम के इशारे पर ही काम होने लगे हैं। हां, यह जरूर है कि मत्रिमंडल में कुछ ऐसे सहयोगी जरूर बैठे हैं, जो समय-समय पर अपना रंग दिखाते रहते हैं लेकिन उससे सीएम यादव को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। ऐसे नेताओं की फितरत नई नहीं है और इससे सीएम बखूबी वाकिफ हैं।

लाडली बहना योजना को बचाया और बढ़ाया

जब यादव सत्ता पर काबिज हुए तो यह कहा गया कि अब लाडली बहना योजना बंद हो जाएगी, लेकिन उन्होंने बहनों को पैसा रिलीज करने में एक दिन की भी देरी नहीं होने दी। उन्होंने खुद स्वीकार किया है कि इससे सरकार पर बोझ बढ़ा है, लेकिन इसके लिए आमदनी बढ़ाने के प्रयास शुरू कर दिए गए हैं।

प्रदेश में निवेश पर लगातार फोकस

सीएम यादव ने निवेश पर फोकस रखते हुए 6 रीजनल इंडस्ट्रियल सम्मिट कराए। इसमें करीब 3 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव आए। निवेश के लिए वे विदेश भी गए। उन्होंने चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य विभाग को एक करते हुए स्वास्थ्य सुविधाओं बढ़ाने की कोशिश की, इसी का नतीजा है कि अब प्रदेश में 50 मेडिकल कॉलेज होने जा रहे हैं।

सनातन परंपरा को बढ़ाने की कोशिश

सीएम ने समय-समय पर यह बता दिया है कि यह सरकार धर्म को अपने साथ लेकर चलेगी। जन्माष्टमी, गीता जयंती , गोवर्धन पूजा जैसे त्योहार सरकार ने धूमधाम से मनाए। यहां तक कि स्कूलों में भी ऐसे त्योहार मनाने की परंपरा शुरू की। युवाओं के रोजगार की दिशा में भी यह सरकार तेजी से पहल कर रही है। प्रदेश में जल्द ही अलगअलग विभागों में करीब एक लाख सरकारी पदों के लिए भर्ती प्रक्रिया शुरू की जाएगी, तैयारी पूरी हो चुकी हैं।

उज्जैन में ऐतिहासिक सिंहस्थ की तैयारी

2028 में लगने वाले सिंहस्थ को भी उन्होंने चुनौती के रूप में ही लिया है। जिस गति से सिंहस्थ के काम चल रहे हैं, उसको लेकर उन्हें अपने ही दल के कुछ मंत्रियों के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा है। सिंहस्थ के लिए होने वाले 19 कार्यों के लिए 5 हजार 882 करोड़ रुपये की मंजूरी दी जा चुकी है। इसके साथ ही सड़कों के लिए अलग से राशि मंजूर की गई है। सिंहस्थ के लिए उज्जैन के साथ ही इंदौर सहित अन्य शहरों के विकास का काम भी शुरू कर दिया गया है।

पूरे देश में मिलने लगी है पहचान

सिसायत की बात करें तो विधानसभा चुनाव में बंपर जीत के बाद लोकसभा चुनाव हुए। इसमें भाजपा ने सभी 29 सीटों पर कब्जा जमाया। कांग्रेस के देश में सबसे मजबूत गढ़ों में शामिल छिंदवाड़ा सीट पर भी 26 साल बाद जीत दर्ज की। भाजपा संगठन ने हरियाणा, जम्मू-कश्मीर सहित अन्य विधानसभा चुनाव में सीएम मोहन यादव को जिम्मेदारी दी। ताज्जुब की बात यह कि जिस भी सीट पर सीएम यादव प्रचार करने गए, उनमें से अधिकांश पर भाजपा विजयी रही। इससे केंद्रीय स्तर पर संगठन में भी उनकी ताकत बढ़ी है।

आगे की मंजिल को आसान बनाने की कोशिश

निश्चित तौर पर एक साल का यह सफर आसान नहीं था। आगे का भी सफर आसान नहीं है, लेकिन जिस विजन से सीएम यादव चल रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं कि चाहे कितना भी तूफान आए, मध्यप्रदेश की नैया को वे पार लगा कर ही दम लेंगे। सीएम लगातार मध्यप्रदेश के आगे का सफर आसान करने की कोशिश में जुटे हुए हैं।

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