सी-21 बिजनेस पार्क की फर्जी एनओसी की जांच शुरू, कलेक्टर के निर्देश पर अपर कलेक्टर ने आईडीए सीईओ को पत्र लिखकर मांगी जानकारी

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इंदौर। तृष्णा गृह निर्माण संस्था की आवासीय उपयोग की भूमि पर फर्जी एनओसी के माध्यम से बने सी-21 बिजनेस पार्क की जांच अब शुरू हो गई है। कलेक्टर आशीष सिंह के संज्ञान में जब मामला आया तो उन्होंने अपर कलेक्टर गौरव बैनल को इसकी जांच की जिम्मेदारी सौंप दी। इसके बाद अपर कलेक्टर बैनल ने इंदौर विकास प्राधिकरण के सीईओ को पत्र लिखकर एनओसी के संबंध में जानकारी मांगी है।

अपर कलेक्टर गौरव बैनल ने अपने पत्र में श्रवण वर्मा की शिकायत का हवाला दिया है। इसमें कहा गया है कि गृह निर्माण संस्था की जमीन लेकर नियम विरुद्ध कमर्शियल बिल्डिंग सी-21 बिजनेस पार्क बनाई गई है। शिकायत की जांच के दौरान इंदौर विकास प्राधिकरण के विधि अधिकारी द्वारा घनश्याम पिता सालीगराम निवासी खजराना, इंदौर को जारी पत्र कमांक 1700 दिनांक 21 दिसंबर 1998 संज्ञान में आया है। बैनल ने लिखा है कि यह पत्र प्राधिकरण द्वारा जारी किया गया है अथवा नहीं? उक्त के संबंध में अपना अभिमत प्रदान करें।

आईडीए के रिकॉर्ड में नहीं है कोई एनओसी

इस संबंध में आईडीए सीईओ आरपी अहिरवार ने बताया था कि आईडीए की जिस एनओसी पर सी-21 बिजनेस पार्क की जमीन की सारी अनुमतियां ली गईं है, उसकी जानकारी आईडीए के रिकॉर्ड में नहीं है। वर्ष 1997, 1998 में जारी 1700 नंबर की एनओसी के आईडीए से जारी होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। जांच में ऐसा कोई दस्तावेज नहीं मिला है, जिससे इस बात की पुष्टि हो कि यह एनओसी आईडीए ने जारी की है। सीईओ अहिरवार ने बताया कि एक कमेटी बना दी है जो इस मामले की बारीकी से जांच करेगी। आईडीए अब उन विभागों को पत्र भी लिखेगा, जहां इस एनओसी को लगाकर अनुमतियां ली गई हैं।

जमीन की रजिस्ट्री में इसी एनओसी का जिक्र

जिस 28/2 खसरे पर यह बिजनेस पार्क बना है, वह आईडीए की स्कीम 53 का हिस्सा है। यह जमीन तृष्णा गृह निर्माण से बेबीलोन इंफ्रस्टाक्चर ने खरीदी थी। इस जमीन की पांच रजिस्ट्री है। इसकी चार रजिस्ट्री पर आईडीए के 21 दिसंबर 1998 के पत्र क्रमांक 1700 का जिक्र किया गया है। इसी तरह एक रजिस्ट्री में 20 अक्टूबर 2005 के आईडीए के पत्र क्रमांक 6864 का जिक्र किया गया है, जिसमें उल्लेख है कि यह जमीन आईडीए के किसी स्कीम में नहीं है। इनमें से कोई भी एनओसी आईडीए के रिकॉर्ड में नहीं है।

कलेक्टर ने कहा-पूरी जांच कराएंगे

जब कलेक्टर आशीष सिंह के संज्ञान में यह मामला लाया गया तो वे हैरान रह गए। जब उन्हें यह बताया गया कि इस जमीन को बेचने के लिए सहकारिता विभाग से किसी तरह की परमिशन नहीं ली गई है। इसके साथ ही नगर एवं ग्राम निवेश विभाग द्वारा आवासीय जमीन पर कमर्शियल परमिशन देने में कई गड़बड़ियां की गई हैं। टीएनसीपी की कई ऐसी नोटशीट मिली है, जिसमें भारी पैमाने पर गड़बड़ियां दिखाई दे रही हैं। इस पर कलेक्टर ने कहा कि वे पूरे मामले की जांच कराएंगे। जांच में सारे तथ्य शामिल किए जाएंगे।

तीन भूमाफियाओं और आईडीए की मिलीभगत

इस पूरे मामले में इंदौर विकास प्राधिकरण तथा नगर एवं ग्राम निवेश विभाग के कई अधिकारियों की भूमिका सामने आ रही है। बताया जाता है कि आईडीए एक अधिकारी मूथा भी इसमें शामिल थे, जो इस तरह के कारनामे करने के लिए जाने जाते हैं। इस फर्जीवाड़े में पिंटू छाबड़ा और चुघ के साथ शहर के कुख्यात तीन भूमाफियाओं की संलिप्तता का भी पता चला है। इन भूमाफियाओं पर कई प्रकरण दर्ज हैं और ये जेल की हवा खाकर भी आ चुके हैं।

क्षतिपूर्ति पत्र पर आलोक भंडारी के भी साइन नहीं

सूत्रों द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार चुघ बिल्डर्स ने बेबीलोन के जिस आलोक भंडारी को यह जमीन बेची थी, उसके कई जगह फर्जी साइन हैं। क्षतिपूर्ति पत्र पर तो आलोक भंडारी के साइन भी नहीं हैं। इस तरह के कई और मामले उजागर हुए हैं, जिनकी जांच भी की जा रही है।

सारे नाम जल्द ही होंगे उजागर

एचबीटीवी के पास ऐसे कई दस्तावेज मौजूद हैं, जिनसे व्यापक पैमाने पर फर्जीवाड़ा उजागर हो रहा है। किस तरह शहर के तीन कुख्यात भूमाफियाओं ने सरकार की आंखों में धूल झोंककर गृह निर्माण संस्था की यह जमीन 26 लाख 74 हजार में खरीदकर करीब 11 करोड़ में बेबीलोन को बेच दी। खास बात यह कि तब बेबीलोन गुड़गांव की कंपनी थी, लेकिन भूमाफियाओं ने खेल इतना तगड़ा किया कि जल्द ही इस कंपनी पर पिंटू छाबड़ा और उनके परिवार का कब्जा हो गया।

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