निगम के गिरेबां तक पहुंच गए हाथ…अब तो सिर्फ पुलिस ही बची है

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बुधवार को इंदौर में जो कुछ भी हुआ, उसे शहरहित में नहीं कहा जा सकता। चाहे कोई भी संगठन हो, सत्ता से जुड़ा हो या संगठन से या फिर आपके लिए वोट लाता हो, किसी को भी धर्म-संस्कृति के नाम पर हुड़दंग करने की छूट नहीं दी जानी चाहिए।

जरा सोचिए, नगर निगम कर्मी किसके थे? भाजपा की सरकार है, निगम में परिषद भाजपा की है, ऐसे में आज के परिदृश्य की परिकल्पना चेतावनी देती है। आप क्या चाहते हैं? क्या फिर से इंदौर की सड़कों को आवारा पशुओं के हवाले कर दिया जाए? हर मोहल्ले में तबेला बना दिया जाए? बड़ी मुश्किल से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने इंदौर की सड़कों से अवारा पशुओं को हटाया, क्या आप फिर से सड़कों पर पशुओं का बसेरा चाहते हैं?

यह मत भूलिए कि अगर सड़कों से पशु नहीं हटे होते तो इदौर शहर को सात बार स्वच्छता में पूरे देश में नंबर वन आने का अवसर ही नहीं मिलता। अरे, नगर निगमकर्मी क्या करने गए थे? अतिक्रमण कर बनाई गई अवैध गौशाला ही तो हटाने गए थे। जब नगर निगम के पास अपनी गौशाला है, तब अवैध गौशाला कैसे चलने दी जा सकती है? और आपने क्या किया, दादागिरी दिखाकर निगमकर्मियों को ही पीट डाला। उनके वाहनों में तोड़फोड़ कर दी। आपकी मारपीट में तीन कर्मचारी घायल भी हो गए।

आप कह रहे हो कि पशुओं को ले जाने का तरीके का विरोध था। अगर ऐसा था तो निगम अधिकारियों से बात की जा सकती थी। आप तो सत्ता और संगठन के लोग हो, फिर कानून अपने हाथ में क्यों लिया? अब आप कह रहे हो कि गौशाला में पशुओं की अच्छे से देखभाल की जा सकती थी और बगैर नोटिस तोड़ दिया गया। क्या आप बता सकते हो कि गैरकानूनी रूप से कोई भी गतिविधि कैसे चलने दी जा सकती है? क्या आप चाहते हो कि पूरे शहर में अवैध रूप से गौशालाओं का संचालन हो?

सच तो यह है कि आपको हुड़दंग मचाने की आदत हो गई है। धर्म के नाम पर सरकार चुप होकर बैठ जाती है। क्या पुलिस-प्रशासन और आपकी सरकार और संगठन को पता नहीं है कि हिन्दूवादी संगठनों के नाम पर क्या चल रहा है? कई फर्जी संगठन खड़े हो गए हैं और पूरे शहर के आयोजनों में क्या-क्या कर रहे हैं, यह आयोजकों से पूछा जाना चाहिए।

अब तक हिंदूवादी संगठनों के नाम पर प्राइवेट संस्थाओं को ही धमकाया जाता था, तोड़फोड़ होती थी, लेकिन अब तो मामला नगर निगम तक पहुंच गया है। ताज्जुब की बात यह है कि जब यह सब हो रहा था तब पुलिस क्या कर रही थी? अगर पुलिस ऐसे ही मौन रही तो एक दिन यही हाथ और यही डंडे उस तक भी पहुंच जाएंगे?

सरकार विशेषकर मुख्यमंत्री और जिले के प्रभारी डॉ.मोहन यादव को भी इस गंभीर मामले पर संज्ञान लेना चाहिए? किसी भी संगठन को इस तरह की दादागिरी की छूट नहीं दी जा सकती। विरोध के नाम पर हुड़दंग तक तो ठीक था, लेकिन अब तो पानी सिर के ऊपर से जा रहा है?

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