कलेक्टर के आदेश पर दिनभर स्टे लेने की कोशिश करता रहा डीसी बोर्ड, बैठक तो हुई लेकिन बदल न पाए डेली कॉलेज का संविधान

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इंदौर। डेली कॉलेज के संविधान बदलने की कोशिशों पर कलेक्टर शिवम वर्मा के आदेश ने पानी फेर दिया। आज डीसी बोर्ड की बैठक तो हुई, लेकिन इस तरह का कोई आदेश पारित न हो पाया। डीसी बोर्ड संघ के कुछ पदाधिकारियों और भोपाल के वरिष्ठ अधिकारियों के माध्यम से कलेक्टर के आदेश पर स्टे लेने की कोशिश करता रहा, लेकिन शाम तक सफलता नहीं मिल पाई। इतना ही नहीं बोर्ड को आज हाईकोर्ट में हुई सुनवाई से भी आस थी, लेकिन कोर्ट ने सुनवाई कर फैसला सुरक्षित रख लिया।

उल्लेखनीय है कि डेली कॉलेज के पैरेंट्स के एक प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर शिवम वर्मा से मुलाकात कर 12 नवंबर यानी आज होने वाली बैठक की जानकारी दी थी। पैरेंट्स ने कहा था कि इस मीटिंग में डीसी बोर्ड संविधान में संशोधन करना चाहता है ताकि वह हमेशा सत्ता में बना रहे। इसके बाद कलेक्टर ने फर्म एंड सोसायटी के सहायक रजिस्ट्रार को इस मामले में आदेश दिए थे। 12 नवंबर यानी बुधवार को होने वाली बैठक को लेकर कलेक्टर शिवम वर्मा के निर्देश पर फर्म एंड सोसायटी का आदेश देने मंगलवार को गए सरकारी कर्मचारियों को डेली कॉलेज में प्रवेश नहीं करने दिया गया। इसके बाद डेली कॉलेज को मेल से नोटिस भेजा गया। इस बैठक को लेकर कलेक्टर के स्पष्ट निर्देश थे कि इसमें संविधान संशोधन जैसा कोई फैसला नहीं किया जाए।

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संघ के पदाधिकारी भोपाल में देते रहे गलत जानकारी

डीसी बोर्ड के कुछ सदस्य संघ के पदाधिकारियों के माध्यम से आज दिन भर भोपाल से कलेक्टर के आदेश पर स्टे लेने की कोशिश करते रहे, लेकिन सफल नहीं हो पाए। संघ के पदाधिकारी शासन-प्रशासन को प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के नाम पर बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं। इनका कहना है कि डेली कॉलेज में जो कुछ भी हो रहा है दिग्विजय सिंह के लोग करा रहे हैं, जबकि शिकायत करने वाले पैरेंट्स हैं। आश्चर्य की बात तो यह है कि जो लोग संविधान बदलने की कोशिश कर रहे हैं, वे दिग्विजय सिंह के ही बिठाए हैं। एसे में पदाधिकारियों को भी गलत जानकारी दी जा रही है और वही जानकारी ऊपर तक पहुंचाई जा रही है।

पूरा मामला एक गुट के कब्जे को लेकर है

दरअसल पूरा मामला वर्तमान में डीसी बोर्ड में काबिज एक गुट के कब्जे को लेकर है। यह गुट डीसी बोर्ड को छोड़ना ही नहीं चाहता। इसके लिए संविधान संशोधन कर ओल्ड डेलियन एसोसिएशन वाली कैटेगरी खत्म करना चाहते हैं। सिर्फ पुराने दानदाता और नए दानदाता वाली कैटेगरी में ही चुनाव कराना चाहते हैं। ओल्ड डेलियन एसोसिएशन वाली कैटेगरी खत्म कर सरकार द्वारा मनोनीत कराने की कोशिश हो रही है। ऐसे में बोर्ड पर उन्हीं लोगों का कब्जा रहेगा, जो पिछले 10 साल से काबिज हैं।

पैरेंट्स कह रहे-कलेक्टर समझ गए, लेकिन बोर्ड नहीं समझ रहा

इस मामले में पैरेंट्स का कहना है कि उन्होंने कलेक्टर शिवम वर्मा से शिकायत की तो वे पूरा मामला तुरंत समझ गए, लेकिन बोर्ड को यह बात समझ नहीं आ रही। पैरेंट्स को अपने बच्चों की शिक्षा की चिन्ता है, जो डीसी बोर्ड की मनमानी के कारण दिन प्रतिदिन यहां बिगड़ती जा रही है। पैरेंट्स का कहना है कि लगातार शिकायतों के बाद भी यह बोर्ड समस्याओं का कोई निराकरण नहीं कर रहा, उल्टा संविधान संशोधन कर अपनी मनमानी चलाना चाहता है।

हाईकोर्ट ने सुनवाई पूरी कर सुरक्षित रखा फैसला

इस मामले में बोर्ड के सदस्य संदीप पारीख की याचिका पर इंदौर हाईकोर्ट में जस्टिस प्रणय वर्मा की कोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने सुनवाई कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। डीसी बोर्ड की इस सुनवाई पर भी नजर थी, लेकिन फैसला नहीं हो पाया।

वॉइस ऑफ डीसी में फिर उठी आवाज

पूर्व छात्र और अभिभावक हमेशा न्याय, जवाबदेही और सच्चाई के पक्ष में खड़े रहे हैं।

हम किसी के खिलाफ नहीं हैं –हम सिर्फ सही बात के लिए खड़े हैं।

रजिस्ट्रार ने देखा कि सब कुछ ठीक नहीं है और पारदर्शिता वापस लाने के लिए एक वार्षिक आम सभा (AGM) बुलाने का निर्देश दिया।

लेकिन उसका स्वागत करने के बजाय, बोर्ड ने पैसे और प्रभाव का इस्तेमाल कर उस पर रोक लगवा दी।

इसके बाद संविधान में बदलाव करने की कोशिश की गई– ताकि वे हमेशा नियंत्रण में बने रहें, बिना किसी विरोध के।

कलेक्टर और सहायक रजिस्ट्रार ने स्थिति को समझा और इसे रोकने के लिए हस्तक्षेप किया।

और अब, उन आदेशों का सम्मान करने के बजाय, बोर्ड ने एक सुप्रीम कोर्ट के वकील को नियुक्त किया है– ताकि वे पारदर्शिता की मांग करने वाले पूर्व छात्रों और अभिभावकों के खिलाफ लड़ सकें।

अगर सब कुछ सही है, तो फिर कानूनी दीवारों के पीछे क्यों छिपना?

पारदर्शिता की रोशनी से डर क्यों?

क्योंकि जब सत्ता जवाबदेही से डरने लगती है, तो वह स्कूल की सेवा करना बंद कर देती है –और खुद की सेवा शुरू कर देती है।

यह राजनीति का मुद्दा नहीं है।

यह सिद्धांतों, सुशासन और हमारे स्कूल के भविष्य का मुद्दा है।

पूर्व छात्र और अभिभावक पारदर्शिता के पक्ष में खड़े हैं– नियंत्रण के नहीं।

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