भोपाल। मध्य प्रदेश में आदिवासियों के घर तोड़े जाने के मुद्दे पर केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी ही भाजपा सरकार के खिलाफ मुखर नजर आ रहे हैं। उन्होंने न केवल अधिकारियों पर जमकर भड़ास निकाल रहे हैं, बल्कि उनके निशाने पर सरकार भी है।
शिवराज ने सीहोर जिले के कोसमी गांव में हुई कार्रवाई को अन्याय बताते हुए अधिकारियों पर सवाल उठाए और प्रभावित परिवारों के समर्थन में धरने पर भी पहुंचे। अब सीहोर कलेक्टर की जांच रिपोर्ट से जुड़े मीडिया खुलासों ने इस मामले में एक नया सवाल खड़ा कर दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक जिन लोगों के पक्ष में शिवराज सिंह चौहान खड़े हुए, उन पर वन भूमि पर कब्जा करने से पहले हजारों सागौन के पौधे नष्ट करने का आरोप है।
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78,700 पौधे नष्ट कर जमीन पर किया कब्जा
प्राप्त जानकारी के अनुसार सीहोर कलेक्टर ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मुख्य सचिव को जांच रिपोर्ट सौंपी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि वन विकास निगम ने वर्ष 2021 में कोसमी बीट के 135 हेक्टेयर क्षेत्र में 3 लाख 37 हजार 500 सागौन के पौधे लगाए थे। इनमें से 78,700 पौधों को नष्ट कर 31.48 हेक्टेयर वन भूमि पर कब्जा किए जाने का दावा किया गया है।
गूगल अर्थ की तस्वीरों में दिख रहा अतिक्रमण
बताया जाता है कि वर्ष 2021 की गूगल अर्थ तस्वीरों में संबंधित क्षेत्र खाली दिखाई देता है, जबकि 2022 की तस्वीरों में वहां अतिक्रमण नजर आने की बात कही गई है। जांच रिपोर्ट में सुनील नामक व्यक्ति और अन्य 11 लोगों पर पौधों को नुकसान पहुंचाने तथा जमीन पर झोपड़ियां बनाकर खेती करने का आरोप है।
अतिक्रमण करने वालों के पास पक्के मकान
एक चौंकाने वाली बात यह भी है कि जो लोग भूमिहीन बनकर अतिक्रण कर बैठे हैं उनमें से कई के पास पक्के मकान भी हैं। भैरूंदा के अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) के हवाले से जांच रिपोर्ट में स्पष्ट बताया गया है कि वन भूमि पर झोपड़ी बनाकर खुद को भूमिहीन होने का दावा करने वाले सभी 9 अतिक्रमणकारियों के मूल गांवों (सिंहपुर और हबीबनगर) में पहले से पक्के मकान और वोटर आईडी कार्ड मौजूद हैं।
घर तोड़ने पर शिवराज ने उठाए थे सवाल
11 अक्टूबर को कोसमी गांव में वन विकास निगम और प्रशासन की कार्रवाई के दौरान आदिवासी परिवारों की झोपड़ियां हटाई गईं। प्रभावित लोगों ने फसलों को नुकसान पहुंचाने और कुएं को मिट्टी से भरने की शिकायत भी की। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान गांव पहुंचे और अधिकारियों की कार्रवाई पर नाराजगी जताई। उन्होंने मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव से बात कर मामले में हस्तक्षेप की मांग की। शिवराज का तर्क था कि गरीब परिवारों को बेघर करने से पहले उनकी स्थिति और मानवीय पहलुओं पर विचार किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने भी मामले को देखने की बात कही।
आखिर इस मामले का पूरा सच क्या है?
इस पूरे प्रकरण में दो पहलुओं को अलग-अलग देखने की जरूरत है। पहला, यदि कार्रवाई के दौरान परिवारों के घर और फसलें हटाई गईं, तो क्या प्रशासन ने सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया और प्रभावित लोगों के पुनर्वास की पर्याप्त व्यवस्था की? दूसरा, यदि जांच रिपोर्ट में सागौन के हजारों पौधे नष्ट कर वन भूमि पर कब्जा करने की बात कही गई है, तो इस कथित नुकसान की जवाबदेही किसकी तय होगी? आदिवासी परिवारों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए, लेकिन वन भूमि और सरकारी पौधारोपण को नुकसान पहुंचाने के आरोप भी जांच से परे नहीं हो सकते। किसी व्यक्ति का आदिवासी होना उसे अधिकारों से वंचित करने का आधार नहीं बन सकता, और न ही किसी भी व्यक्ति को कानून से ऊपर माना जा सकता है।
अब तो शिवराज पर ही उठ रहे सवाल
उस पूरे प्रकरण में अब तो शिवराज सिंह चौहान पर ही सवाल उठ रहे हैं। क्या उन्होंने प्रभावित परिवारों के समर्थन में आने से पहले वन भूमि पर कब्जे और सागौन के पौधों को नुकसान पहुंचाने के आरोपों की पूरी जानकारी ली थी? यदि प्रशासन की रिपोर्ट में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं, तो क्या शिवराज सिंह चौहान पौधों को नष्ट करने और वन भूमि पर कब्जा करने के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की मांग करेंगे? क्या वे केवल घर तोड़ने की कार्रवाई पर सवाल उठा रहे हैं, या वन संपदा को हुए कथित नुकसान की जवाबदेही तय करने के पक्ष में भी हैं?
क्या भाजपा के भीतर चल रहा मतभेद
शिवराज सिंह चौहान लंबे समय तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं और बुधनी क्षेत्र से उनका पुराना राजनीतिक जुड़ाव रहा है। कोसमी की घटना में उनका हस्तक्षेप राज्य सरकार के लिए भी असहज स्थिति पैदा करता है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि एक ओर केंद्रीय मंत्री कार्रवाई को अन्यायपूर्ण बता रहे हैं, जबकि दूसरी ओर प्रशासनिक रिपोर्ट में वन भूमि पर कब्जे और सागौन के पौधों को नुकसान पहुंचाने के गंभीर आरोप दर्ज हैं। अब निगाहें राज्य सरकार की आगे की कार्रवाई पर हैं। क्या सरकार प्रशासनिक प्रक्रिया में किसी चूक की जांच करेगी?



