अपने नेताओं की हरकतें देख कार्यकर्ताओं का एक ही सवाल…आखिर कब तक हाशिए पर रहेगी कांग्रेस?

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लंबे समय से मध्यप्रदेश की सत्ता से बेदखल कांग्रेस के कार्यकर्ता अपनी पार्टी के नेताओं की हरकतें देख चिन्तित हैं। विधानसभा चुनाव और उसके बाद लोकसभा चुनाव तक पार्टी बची ही नहीं। कई बड़े नेता अपने साथ लाखों की संख्या में कार्यकर्ता लेकर भाजपा ज्वाइन कर चुके हैं। जो नेता व कार्यकर्ता बचे हैं, वे नेतृत्व संकट का सामना कर रहे हैं। प्रदेश अध्यक्ष से लेकर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को आपस में भिड़ने से ही फुर्सत नहीं है। ऐसे में आज भी कांग्रेस का झंडा लेकर बिना लाभ-हानि पार्टी का साथ दे रहा कार्यकर्ता भ्रमित है।

विधानसभा चुनाव के बाद पार्टी ने कमलनाथ से प्रदेश कांग्रेस की कमान लेकर जीतू पटवारी को दे दी थी। कुछ पटवारी का स्वभाव, कुछ कांग्रेस की तासीर और कुछ भाजपा के प्रयास से कांग्रेस टूटती गई। हालत यह हो गई कि भाजपा ने इंदौर से लोकसभा का कांग्रेस उम्मीदवार ही गायब कर दिया। माना कि पटवारी में लाख ऐब है, लेकिन जब नेतृत्व उनके हाथ में दे दिया था तो प्रोटोकॉल का पालन तो करना चाहिए था। सभी बड़े नेता अपनी अलग खेमेबाजी में जुटे रहे। कई वरिष्ठ पटवारी के पीछे हाथ धोकर पड़ गए। पटवारी अपनी तरफ से कोशिश करते रहे, लेकिन किसी भी बड़े नेता का साथ मिलता दिखाई नहीं दिया।

जब तक कमलनाथ थे, उन्होंने मध्यप्रदेश में कांग्रेस को पटरी पर लाने की पूरी कोशिश की। इसी का परिणाम था थोड़े समय के लिए ही सही, एक बार कांग्रेस को कुर्सी मिली। विधानसभा चुनाव के बाद लोकसभा चुनाव तक कमलनाथ की प्रदेश में कहीं उपस्थिति नहीं दिखी। भाजपा ने उनका छिंदवाड़ा भी छीन लिया। इतना कुछ होने के बावजूद भी कमलनाथ चाहते तो एक अभिभावक की तरह कांग्रेस को मार्गदर्शन दे सकते थे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह यदा-कदा बयानों में ही नजर आते हैं। अरुण यादव सहित कई नेता ना तो किसी आंदोलन में नजर आ रहे हैं और ना ही बयानों में।

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंगार ने माहौल बना रखा है, लेकिन कार्यकर्ताओं को डर है कि वे भी भाजपा के कतिपय नेताओं के इशारे पर न चलने लगें। भाजपा में कुछ नेता ऐसे हैं जो बड़े पद पर रहते हुए भी अपनी ही सरकार की कब्र खोदते रहे हैं। इसके लिए उन्होंने हमेशा कांग्रेस के बड़े नेताओं का सहारा लिया। सिंगार के कुछ बयानों से कार्यकर्ताओं को ऐसा लगता है कि वे भी किसी ऐसे नेता के बहकावे में तो नहीं हैं। सिंगार कोअपनी लाइन बड़ी करनी चाहिए। उनके पास पद भी है, अगर वे चाहें तो कांग्रेस को प्रदेश में जिंदा रख सकते हैं।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को यह सोचना होगा-बिना फंड, बिना नेता के भी जो कार्यकर्ता आज भी पार्टी के लिए खून-पसीना बहाने को तैयार है, उसे कैसे संभाला जाए।

कांग्रेस का आम कार्यकर्ता चाहता है कि वरिष्ठ नेता जनता के पास जाएं। उनकी समस्याओं को लेकर आंदोलन करें। सरकार की गलत नीतियों का विरोध करें, लेकिन इसके लिए भी कोई आगे नहीं आ रहा। ऐसे में आम कार्यकर्ता अपनी अलमारी में संभालकर रखा कांग्रेस का झंडा निकाल ही नहीं पा रहा।

जागिए, उठिए और देखिए…आपके सामने पूरा मैदान है। आम जनता के दु:ख-दर्द को समझिए। उसका साझीदार बनिए। एक ना एक दिन तो सफलता मिलेगी…लेकिन इसके लिए प्रयास तो करने होंगे…

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