क्या अपने विजयपुर विधायक मल्होत्रा को बचा नहीं सकती थी कांग्रेस, चुनाव शून्य होने के बाद पार्टी नेतृत्व पर उठ रहे सवाल

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भोपाल। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर बेंच ने विजयपुर विधानसभा सीट से कांग्रेस विधायक मुकेश मल्होत्रा का चुनाव शून्य घोषित कर दिया है। अब पूर्व मंत्री रामनिवास रावत यहां के विधायक होंगे। इस फैसले के बाद प्रदेश कांग्रेस संगठन पर सवाल उठ रहे हैं। पार्टी के ही लोग कह रहे हैं कि प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व चाहता तो मल्होत्रा को बचा सकता था।

कांग्रेस के लोग ही कह रहे हैं कि विजयपुर विधानसभा क्षेत्र के लाखों मतदाताओं द्वारा दिए गए जनादेश को अदालत में हार जाना केवल एक कानूनी घटना नहीं, बल्कि इससे कांग्रेस संगठन की विफलता भी सामने आ रही है। राजनीतिक और कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि इस मामले में शुरुआत से ही मजबूत कानूनी रणनीति बनाई जाती और देश के वरिष्ठ संवैधानिक वकीलों की प्रभावी पैरवी सुनिश्चित की जाती, तो स्थिति अलग हो सकती थी। कांग्रेस पार्टी के पास ऐसे कई अनुभवी और प्रतिष्ठित वरिष्ठ अधिवक्ता उपलब्ध हैं, जिनकी विशेषज्ञता चुनावी कानून और संवैधानिक मामलों में मानी जाती है, लेकिन इस महत्वपूर्ण प्रकरण में उनका प्रभावी उपयोग नहीं किया जाना गंभीर प्रश्न खड़े करता है

कांग्रेस ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न क्यों नहीं बनाया

यह भी प्रश्न उठ रहा है कि जब मामला सीधे तौर पर जनादेश और पार्टी की प्रतिष्ठा से जुड़ा था, तब प्रदेश कांग्रेस संगठन ने इसे सर्वोच्च प्राथमिकता क्यों नहीं दी। हजारों कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कठिन परिस्थितियों में चुनाव जीतने के लिए दिनरात मेहनत की थी, लेकिन अदालत में पार्टी कमजोर रणनीति के कारण उनके परिश्रम पर पानी फिरता दिखाई दे रहा है।

अगर पार्टी करे समीक्षा तो खुले पोल

राजनीतिक हलकों में यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या संगठनात्मक स्तर पर समुचित तैयारी और समन्वय की कमी के कारण यह स्थिति बनी या फिर यह केवल लापरवाही का परिणाम है। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व पूरे मामले की निष्पक्ष समीक्षा कराए और यह स्पष्ट करे कि आखिर ऐसी कौनसी परिस्थितियां थीं जिनके कारण इस महत्वपूर्ण मामले में अपेक्षित कानूनी मजबूती नहीं दिखाई गई। विजयपुर के मतदाताओं और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मन में सवाल है कि उनके द्वारा दिए गए जनादेश की रक्षा के लिए संगठन ने कितनी गंभीरता से प्रयास किए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का विश्वास सर्वोपरि होता है और ऐसे मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही बेहद आवश्यक है।

वरिष्ठ नेताओं पर लग रहे मिलीभगत के आरोप

कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता इस मामले में पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं पर मिलीभगत का आरोप लगा रहे हैं। नेता कह रहे हैं कि वरिष्ठों ने भाजपा से मिलीभगत कर हाइकोर्ट में वरिष्ठ वकीलों से पैरवी नहीं कराई। जानबूझकर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल,अभिषेक मनु संघवी आदि का उपयोग नहीं किया गया। इसी का परिणाम रहा कि मल्होत्रा को विधायकी गंवानी पड़ी।

पांच करोड़ और बॉक्साइट की खदान

कांग्रेस के सूत्र कह रहे हैं कि इस मामले में पांच करोड़ रुपए नकद और दो बॉक्साइट के खदान की चर्चा हो रही है। कहा जा रहा है कि कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता को हाल ही में दो बॉक्साइट की खदानें दी गई हैं। इस चर्चा में कितना दम है, पता नहीं लेकिन इतना तो तय है कि अगर पार्टी संगठन ने ध्यान दिया होता तो मल्होत्रा की यह हालत नहीं होती।

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