महापौरजी, सफलता के तीन साल पूरे होने पर बधाई के साथ जनता पूछ रही है सवाल- आखिर किस मजबूरी में भूमाफियाओं को सौंप रहे रीजनल पार्क?

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इंदौर। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने अपने कार्यकाल के तीन साल आज ही पूरे किए हैं। कुछ ही दिनों पहले वे दिल्ली से स्वच्छता वाला अवॉर्ड भी ले आए हैं। सबकुछ ठीक चल रहा है। काम भी अच्छा हो रहा है, लेकिन रीजनल पार्क निजी कंपनी को सौंपे जाने को लेकर शहर से एक आवाज उठ रही है जिसे महापौर सुन नहीं पा रहे। महापौर एक ऐसी कंपनी को इसका ठेका देने जा रहे हैं, जो शहर के कुख्यात भूमाफियाओं की है। ताज्जुब तो तब होता है कि इस टेंडर में गड़बड़ी की खबरें आने के बाद भी महापौर इसी कंपनी को टेंडर देना चाहते हैं।

उल्लेखनीय है कि नगर निगम रीजनल पार्क को ठेके पर देने के लिए पिछले काफी समय से परेशान है। अब जाकर ई टेंडर के माध्यम से 2 करोड़ 20 लाख प्रति वर्ष की बोली लगी है। महापौर पुष्यमित्र भार्गव अब हर हाल में यह ठेका मंजूर करवाना चाहते हैं। वह भी तब जब ई टेंडर में भाग लेने वाली कंपनियों को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। जिस कंपनी ऑरेन्ज ने सबसे ज्यादा बोली लगाई है, उसने अपने टेंडर में कई बार संशोधन किए हैं। ऐसे में फिर से टेंडर क्यों नहीं बुलवाए जा रहे।

उल्लेखनीय है कि नगर निगम ने 5 मार्च 2025 को रीजनल पार्क के लिए टेंडर बुलाए थे, जिसकी अंतिम तिथि 3 अप्रैल थी। इसमें तीन कंपनियों के आवेदन आए। इनमें से एक कंपनी इंदौर की ऑरेंज मेगास्ट्रचर एलएलपी और रिक्लूसिव रियल एस्टेट एंड एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड ज्वाइंट वेंचर है। दूसरी कंपनी चेन्नई की अरिहंत फाउंडेशन एंड हाउसिंग प्राइवेट लिमिटेड है। तीसरी कंपनी रायपुर की सोना इन्फ्रापार्क प्राइवेट लिमिटेड है। इसमें सबसे ज्यादा 2.26 करोड़ की बोली ऑरेन्ज ने लगाई है। दूसरे नंबर पर अरिहंत फाउंडेशन है, जिसने 1.81 करोड़ का टेंडर भरा है। तीसरे नंबर पर सोना इंफ्रापार्क है, जिसने 1 करोड़ 72 लाख 33 हजार की बोली लगाई है।

ऑरेन्ज ने टेंडर में आठ बार किए हैं संशोधन

सूत्र बताते हैं कि इसके पहले भी जब रीजनल पार्क के लिए टेंडर बुलवाए गए थे तो ऑरेन्ज ने करीब सवा करोड़ की बोली लगाई थी। इस बार के टेंडर पर इसलिए सवाल उठ रहे हैं कि ऑरेन्ज ने आठ बार टेंडर में संशोधन किए हैं। बताया जाता है कि 3 अप्रैल को बिड खत्म होने से कुछ ही देर पहले भी ऑरेन्ज ने संशोधन किया था। ऑरेन्ज ने 5 मार्च को दो बार, फिर 12 मार्च और फिर 25 मार्च को टेंडर में संशोधन किए हैं। इसी तरह 3 अप्रैल को संशोधन हुआ है और हद तो 4 अप्रैल को हो गई, जब तीन बार टेंडर में संशोधन किए गए हैं। इससे ई टेंडर में भी मिलीभगत की आशंका जाहिर की जा रही है। इस प्रक्रिया से जुड़ा कोई है, जो लगातार ऑरेन्ज को अपडेट देता रहा।

बार की कंपनियों से ज्यादा मिल सकते हैं पैसे

भाजपा के कई नेता और महापौर परिषद के कुछ सदस्यों का कहना है कि रीजनल पार्क जैसी प्रॉपर्टी जब किसी निजी कंपनी को दी जा रही है तो नगर निगम को इससे ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना चाहिए। क्योंकि, कोई भी कंपनी यहां आएगी तो खाने-पीने की वस्तुओं से लेकर हर सुविधा का ज्यादा से ज्यादा पैसा वसूलेगी। इससे जनता का तो कोई फायदा नहीं हो रहा, कम से कम नगर निगम का ही हो जाए। पहली बार में एक करोड़ 16 लाख का टेंडर आया था, अब 2 करोड़ 20 लाख पहुंचा है। अगर बाहर की बड़ी कंपनियां आती हैं तो निश्चित तौर पर निगम को ज्यादा फायदा होगा, फिर भी महापौर लोकल कंपनी को ही टेंडर देने की पुरजोर कोशिश कर रहे हैं।

मेहता और छाबड़ा की है कंपनी

जिस कंपनी को नगर निगम टेंडर देने जा रहा है वह कंपनी राजेश मेहता और गुरजीत सिंह छाबड़ा यानी पिंटू छाबड़ा की है। इसका ऑफिस पिंटू छाबड़ा के सी-21 बिजनेस पार्क में हैं। ऑरेंज मेगास्ट्रक्चर एलएलपी के भागीदार राजेश मेहता और पिंटू छाबड़ा हैं, जबकि इसकी दूसरी कंपनी रिक्लूसिव रियल एस्टेट एंड एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के डारेक्टर पिंटू छाबड़ा और करण सिंह छाबड़ा हैं।

लोग कर रहे हैं सवाल डील है या मजबूरी

इस टेंडर प्रक्रिया पर भाजपा के लोग ही सवाल उठा रहे हैं कि आखिर महापौर की क्या मजबूरी है कि सबकुछ जानते हुए भी वे इस टेंडर को मंजूर करवा रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि महापौर परिषद के राजेन्द्र राठौर सहित कुछ सदस्यों ने भी इस पर भी आपत्ति ली है। लोग कह रहे हैं कि इसके बावजूद इस टेंडर को मंजूर कराना आखिर मजबूरी है या इसके लिए कोई डील हुई है।

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