एआई समिट विवाद के बाद भी सॉरी, ‘गलगोटिया’ नहीं हैं हम!

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डॉ.प्रकाश हिन्दुस्तानी, वरिष्ठ पत्रकार
एआई इम्पैक्ट समिट में भारत की भद पिटी, बहुत बुरा हुआ, लेकिन हम हमेशा से इतने बड़े ‘गलगोटिया’ नहीं हैं! हम सदियों से हार्ड वर्क और स्मार्ट वर्क करते आ रहे थे, लेकिन फिर हमें यह सिखाया जाने लगा कि हार्ड वर्क नहीं, केवल स्मार्ट वर्क करो! इस कारण हम हार्डली वर्क करने लगे।
इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ भारतीयों ने क्रांतिकारी खोजें कीं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान या ‘पेटेंट’ किसी पश्चिमी वैज्ञानिक को मिल गया। इसके पीछे अक्सर उपनिवेशवाद, संसाधनों की कमी या उस समय की वैश्विक राजनीति का हाथ रहा। हम हार्ड वर्क ही करते रह गए और दूसरे स्मार्ट वर्क करके आगे पहुँच गए।
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भारत ने इजाद की, पश्चिम ने नोबेल ले लिया :
रेडियो के आविष्कार का श्रेय गुग्लिएल्मो मार्कोनी को दिया जाता है, इसके लिए 1909 में उनको नोबेल पुरस्कार भी मिला।
सच्चाई यह है कि मार्कोनी से पहले 1895 में ही जगदीशचंद्र बोस ने कलकत्ता में ‘मिलीमीटर तरंगों’ का सार्वजनिक प्रदर्शन किया था। उन्होंने ‘कोहेरर’ (Coherer) नामक उपकरण को सुधारा, जिसके बिना रेडियो सिग्नल पकड़ना संभव नहीं था।
लेकिन उन्हें इस खोज का श्रेय क्यों नहीं मिला? बोस ने अपने काम का पेटेंट कराने में कोई रुचि नहीं दिखाई। उनका मानना था कि विज्ञान सार्वजनिक संपत्ति होनी चाहिए। जबकि मार्कोनी ने बाद में इसी तकनीक का उपयोग करके कमर्शियल सफलता हासिल की।
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फाइबर ऑप्टिक्स के पिता नरिंदर कपानी थे, लेकिन नोबेल चार्ल्स काओ को :
आज अक्खी दुनिया हाई-स्पीड इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे हैं, वह फाइबर ऑप्टिक्स की देन है।इंडियन साइंटिस्ट नरिंदर सिंह कपानी को ‘फादर ऑफ फाइबर ऑप्टिक्स’ कहा जाता है। उन्होंने ही 1950 के दशक में पहली बार प्रकाश को मोड़ने की तकनीक यानी टोटल इंटरनल रिफ्लेक्शन का प्रदर्शन किया था। 2009 में फाइबर ऑप्टिक्स के लिए चार्ल्स काओ को नोबेल पुरस्कार मिला, कपानी को नजरअंदाज कर दिया गया।इस पर वैज्ञानिक जगत में काफी बहस भी हुई थी।
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भाभा स्कैटरिंग की खोज :
हमारे होमी जहांगीर भाभा ने परमाणु ऊर्जा और कॉस्मिक किरणों पर जो शोध किया, वह उस समय के हिसाब से बहुत आगे था। उन्होंने ‘भाभा स्कैटरिंग’ (Bhabha Scattering) की खोज की, जो इलेक्ट्रॉन-पॉज़िट्रान टकराव को समझाती है। पश्चिमी देशों के दबदबे और उस दौर के संसाधनों की कमी के कारण उनके कई मौलिक सिद्धांतों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह प्रसिद्धि नहीं मिली जो उनके समकक्ष यूरोपीय वैज्ञानिकों को मिली।
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ट्रॉपिकल ईस्टरली जेट स्ट्रीम कोटेश्वरम की खोज थी :
मौसम विज्ञान में ‘जेट स्ट्रीम’ मतलब तेज हवाओं की धारा की खोज का श्रेय अक्सर द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान पश्चिमी मौसम वैज्ञानिकों को दिया जाता है। जबकि भारतीय मौसम विज्ञानी पी.के. कोटेश्वरम ने पहली बार तिब्बती पठार के ऊपर बहने वाली उष्णकटिबंधीय पूर्वी जेट स्ट्रीम (Tropical Easterly Jet Stream) की खोज की और मानसून के साथ उसके संबंध को स्पष्ट किया। भारत परतंत्र था इसलिए उनके शोध पत्रों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह पहचान नहीं मिली जो उनके बाद आए अमेरिकी शोधकर्ताओं को मिली।
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चेचक का टीका हमारा पुराना ‘देसी जादू’ था, जेनर ने इसे वैज्ञानिक बना दिया :
भारत में सदियों से ‘वैरीओलेशन’ (Variolation) की प्रक्रिया प्रचलित थी, जिसमें चेचक के सूखे घावों के पाउडर को स्वस्थ व्यक्ति की त्वचा पर लगाकर इम्युनिटी विकसित की जाती थी।जैसे डॉ. जे.जे. हॉवेल ब्रिटिश डॉक्टर ने बंगाल में इस तकनीक को देखा और इसके बारे में अपनी डायरी में लिखा था। पश्चिम ने इसे ‘अंधविश्वास’ या ‘देसी चिकित्सा’ कहकर खारिज कर दिया, जब तक कि जेनर ने इसे वैज्ञानिक रूप में पेश नहीं किया।
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पौधे भी दर्द महसूस करते हैं – बोस ने बताया, रॉयल सोसाइटी ने 30 साल तक ‘हम्म’ किया! :
जगदीश चंद्र बोस ने ‘क्रेसकोग्राफ’ (Crescograph) का आविष्कार किया और साबित किया कि पौधे संगीत, दर्द और वातावरण के प्रति संवेदनशील होते हैं। श्रेय क्यों नहीं मिला? उनके काम को शुरुआत में लंदन की रॉयल सोसाइटी ने संदेह की दृष्टि से देखा, और उनकी खोज को पूरी तरह स्वीकार करने में दशकों लगा दिए।
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शिवकर बापूजी तलपड़े ने 1895 में प्लेन उड़ाया, राइट ब्रदर्स को 1903 में पता चला – लेट लतीफी!
ऑरविल राइट और विल्बर राइट भाइयों के 1903 में विमान उड़ाने से 8 साल पहले, 1895 में, मुंबई के चौपाटी बीच पर भारतीय वैज्ञानिक शिवकर बापूजी तलपड़े ने दुनिया का पहला विमान उड़ाया था। उस विमान ने 1500 फ़ीट तक उड़ान भरी थी। उस विमान का नाम ‘मरुत्सखा’ (वायु का मित्र) था।
तलपड़े ने अपने विमान में ‘अंशुवाहिनी’ नामक तकनीक का प्रयोग करने की कोशिश की थी। ‘वैमानिक शास्त्र’ के अनुसार, सूर्य की किरणों में 8 प्रकार की शक्तियां होती हैं। इन किरणों को विशेष प्रकार के ‘दर्पणों’ और ‘लेंसों’ के माध्यम से केंद्रित करके ऊर्जा बनाई जा सकती है।
तलपड़े जी का यह प्रयोग यह आज के सोलर पैनल मतलब फ़ोटोवोल्टेइकसेल्स के शुरुआती विचार जैसा है, जो 19वीं सदी के हिसाब से बहुत उन्नत सोच थी। भारत में उन्हें नायक के रूप में देखा जाता है। उनके जीवन पर ‘हवाईज़ादा’ नामक बॉलीवुड फिल्म भी बनी है, जिसमें आयुष्मान खुराना ने उनका किरदार निभाया था।
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आज गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, IBM – सबके बॉस भारतीय, लेकिन कंपनी का मालिकाना हक? दूसरों के पास! CEO लेवल पर धमाल, लेकिन ओनरशिप जीरो !आज दुनिया की कई बड़ी-बड़ी कंपनियों का संचालन भारतीयों के हाथों में है। माइक्रोसॉफ्ट, अल्फाबेट-गूगल, यूट्यूब, आईबीएम, गूगल क्लाउड, माइक्रॉन टेक्नोलॉजी, परप्लेक्ससिटी एआई जैसी कंपनियों के सीईओ भारतीय हैं। वर्ल्ड बैंक, फेडेक्स, कॉग्निजेंट, स्टारबक्स, फैशन कंपनी चैनल की बागडोर भारतीय संभाल रहे हैं। फिर यह गलगोटिया का ब्लंडर कैसे हो गया? क्या इसके लिए हमारी इवेंटबाजी जवाबदार है?
हम मास्टर हैं, स्कूल के मालिक दूसरे – एंटरप्रेन्योरशिप में ‘फेल’ लेकिन टैलेंट में ‘टॉप’! अक्कल के मामले में भारतीय कभी पीछे नहीं रहे। वे काम करते हैं, क्रेडिट नहीं लेते। दुनिया की टॉप आईटी कंपनियां उनके भरोसे चल रही है, पर वे उनके मालिक नहीं हैं। उनकी सोच मालिकों वाली रही ही नहीं। वे खुद का वेंचर करने के बजाय नौकरी पसंद करते हैं। आंत्रप्रेन्योरशिप उनमें कम है। वे मास्टर हैं, स्कूल के मालिक दूसरे हैं!

Ardhendu Bhushan
Ardhendu Bhushanhttp://www.hbtvnews.com
Ardhendhu Bhushan is a senior consulting editor with extensive experience in the media industry. He is recognized for his sharp editorial insight and strategic guidance.

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