भारतीय रिजर्व बैंक ने इस बार रेपो दर में कोई बदलाव नहीं करते हुए इसे 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा है। यह घोषणा रिजर्व बैंक के गवर्नर द्वारा मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद की गई।
छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति की यह बैठक ऐसे समय में हुई, जब पश्चिम एशिया में तनाव चरम पर है, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल है और रुपये में भी गिरावट देखने को मिल रही है। ऐसे हालात में दरों को स्थिर रखना एक संतुलित कदम माना जा रहा है।
गौरतलब है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने फरवरी 2025 से अब तक कुल 125 आधार अंकों की कटौती की है, जो 2019 के बाद सबसे तेज गिरावट मानी जा रही है। फरवरी 2026 की पिछली बैठक में भी दरों को स्थिर रखा गया था, ताकि पहले की गई कटौतियों के प्रभाव का आकलन किया जा सके।
आर्थिक मोर्चे पर भी केंद्रीय बैंक ने सकारात्मक संकेत दिए हैं। वित्त वर्ष 2027 की पहली तिमाही के लिए जीडीपी वृद्धि का अनुमान 6.7 प्रतिशत से बढ़ाकर 6.9 प्रतिशत कर दिया गया है, जबकि दूसरी तिमाही के लिए यह अनुमान 6.8 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं, मुद्रास्फीति का अनुमान भी पहली तिमाही के लिए 4.0 प्रतिशत और दूसरी तिमाही के लिए 4.2 प्रतिशत रखा गया है।
क्या होती है रेपो दर?
रेपो दर वह ब्याज दर होती है, जिस पर केंद्रीय बैंक वाणिज्यिक बैंकों को कर्ज देता है। जब बैंकों के पास धन की कमी होती है, तो वे भारतीय रिजर्व बैंक से उधार लेते हैं और उस पर जो ब्याज देते हैं, वही रेपो दर कहलाती है।
जब महंगाई बढ़ती है, तो रिजर्व बैंक रेपो दर बढ़ा देता है, जिससे कर्ज महंगा हो जाता है और लोग खर्च कम करते हैं—इससे महंगाई पर नियंत्रण में मदद मिलती है। वहीं, आर्थिक सुस्ती के दौर में रेपो दर घटाकर सस्ते कर्ज को बढ़ावा दिया जाता है, जिससे निवेश और खपत में वृद्धि होती है।
अगर आपका कर्ज फ्लोटिंग या रेपो से जुड़ा है, तो रेपो दर में बदलाव का सीधा असर आपकी मासिक किस्त पर पड़ता है—दर घटने पर ईएमआई कम हो सकती है, जबकि दर बढ़ने पर इसका बोझ बढ़ जाता है।


