लोकतंत्र या आरोपतंत्र? बिना सबूत के सियासी बयानबाजी  पर कब लगेगी लगाम

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भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र माना जाता है—जहां जनता का जनादेश सर्वोपरि होता है, जहां संस्थाएं संविधान के तहत काम करती हैं, और जहां सत्ता बदलती है तो शांतिपूर्ण तरीके से। लेकिन हाल के वर्षों में एक चिंताजनक प्रवृत्ति तेज़ी से उभरी है—बिना ठोस सबूत के चुनाव परिणामों, संवैधानिक संस्थाओं और पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़े करना।

चुनाव परिणाम आते ही हारने वाला पक्ष अक्सर ईवीएम पर सवाल उठाता है, चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा करता है, और कभी-कभी तो सीधे-सीधे “वोट चोरी”, “जनादेश की लूट” जैसे गंभीर आरोप लगा देता है। यह सिलसिला अब इतना आम हो गया है कि जैसे यह राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा बन चुका हो। सवाल यह है—क्या यही लोकतंत्र है?

जब कोई नेता यह कहता है कि “100 सीटें लूटी गईं” या “हर छठा सांसद चोरी से जीता है”, तो क्या वह सिर्फ एक राजनीतिक बयान दे रहा होता है, या वह करोड़ों मतदाताओं के फैसले पर सवाल उठा रहा होता है? लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है। ऐसे में बिना प्रमाण के इस तरह के आरोप न सिर्फ विरोधियों पर हमला हैं, बल्कि सीधे-सीधे जनता के निर्णय का अपमान भी हैं।

और यह यहीं नहीं रुकता। प्रधानमंत्री जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति के लिए “चोर” जैसे शब्दों का इस्तेमाल—क्या यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है या राजनीतिक मर्यादा का पतन? अभिव्यक्ति की आज़ादी का मतलब यह तो नहीं कि कोई भी, किसी भी स्तर पर, बिना जिम्मेदारी के कुछ भी कह दे।आश्चर्य तो तब होता है जब नेता सेना ,हमारे सुरक्षा बलों तक को नहीं बक्शते सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत मांगे जाते है सेना की कार्यवाही पर सवाल उठाए जाते हैं पूरी दुनिया  में देश को बदनाम कर ख़ुशी मनाते है ऐसा  सिर्फ भारत और भारत के लोकतंत्र में ही संभव है 

दुनिया के अन्य लोकतांत्रिक देशों पर नजर डालें तो वहां भी राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप होते हैं, लेकिन बिना सबूत के चुनावी प्रक्रिया को इस तरह कटघरे में खड़ा करना आम नहीं है। अमेरिका, ब्रिटेन या जर्मनी जैसे देशों में यदि कोई नेता चुनावी धांधली का आरोप लगाता है, तो उसे अदालत या संस्थाओं के सामने ठोस प्रमाण देने पड़ते हैं। वहां केवल बयानबाज़ी से काम नहीं चलता।कई देशो में राष्ट्राध्यक्ष या सरकार  के खिलाफ बोलने तक पर जेल में ठूंस दिया जाता है यातनाएं दी जाती है भारत  में आजादी है तो उसका बेजा फायदा अपने स्वार्थों के लिए किया जा रहा है और कोई देखने सुनने वाला तक नहीं क्या इसे ही राम राज्य कहते है 

भारत में समस्या यह है कि जवाबदेही का अभाव दिखने लगा है। नेता बयान देते हैं, सुर्खियां बनती हैं, लेकिन जब उनसे सबूत मांगा जाता है तो मामला ठंडा पड़ जाता है। न कोई कानूनी कार्रवाई होती है, न ही कोई स्पष्ट जवाबदेही तय होती है। इसका परिणाम यह होता है कि जनता के बीच भ्रम फैलता है और संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होता है।

अब सवाल उठता है—क्या इस पर रोक नहीं लगनी चाहिए?

क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि सरकार ,चुनाव आयोग या सर्वोच्च न्यायालय इस तरह के बयानों के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करे? यदि कोई नेता चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर आरोप लगाता है, तो उसे एक निश्चित समय सीमा में प्रमाण प्रस्तुत करना अनिवार्य हो। यदि वह ऐसा नहीं कर पाता, तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए—चाहे वह जुर्माना हो, चुनाव लड़ने पर अस्थायी रोक हो, या सार्वजनिक माफी।

लोकतंत्र केवल अधिकारों का नाम नहीं है, यह जिम्मेदारियों का भी नाम है। नेताओं को यह समझना होगा कि उनके शब्दों का असर केवल राजनीतिक नहीं, सामाजिक और संस्थागत भी होता है। बार-बार बिना प्रमाण के आरोप लगाने से लोकतंत्र मजबूत नहीं, कमजोर होता है।

जनता को भी अब जागरूक होना होगा। हर बयान को सच मानने के बजाय सवाल पूछना होगा—“सबूत क्या है?” क्योंकि अंततः लोकतंत्र की असली ताकत जनता ही है, और यदि जनता भ्रमित होगी, तो पूरा तंत्र डगमगा जाएगा।

समय आ गया है कि इस “आरोपतंत्र” पर लगाम लगे और लोकतंत्र को उसकी गरिमा के साथ आगे बढ़ाया जाए—जहां बहस हो, आलोचना हो, लेकिन तथ्य और जिम्मेदारी के साथ।

अभिलाष शुक्ला 

Abhilash Shukla (Editor)
Abhilash Shukla (Editor)http://www.hbtvnews.com
Abhilash Shukla is an experienced editor with over 28 years in journalism. He is known for delivering balanced, impactful, and credible news coverage.

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